यहां समस्याएं भी हैं, दर्द भी है... पर चुनावों में ये दर्द मुद्दे नहीं बनते। लहर हावी हो जाती है। कभी जातिवाद की तो कभी किसी की। इन लहरों पर सवार होकर नेता संसद पहुंचते रहे। ...पूरे इत्मीनान के साथ।
वजह यह रही कि यहां समीकरण चलते हैं। लहरों के सहारे संसद तक पहुंचने वालों ने शायद इसी वजह से विकास में कोई खास दिलचस्पी नहीं ली।
जिला पीछे छूट गया। आलम यह है कि जिला मुख्यालय का सूबे की राजधानी से ही कोई रेल संपर्क नहीं है। संगम एक्सप्रेस और मेरठ खुर्जा पैसेंजर जरूर यहां से गुजरती है।
रेलवे लाइन का जाल बिछाने के लिए हर बार बजट से पहले हो-हल्ला होता है, लेकिन जल्द शांत हो जाता है। इस बार भी चुनाव में यह मुद्दा बनता नजर नहीं आ रहा। टूटी सड़कों पर चलना दुश्वार है।
जयंत चौधरी गहरे गड्ढों में पदयात्रा कर और कांग्रेस ने सड़क पर भरे पानी में बैठकर लोगों का ध्यान खींचने की एक बार कोशिश जरूर की, लेकिन मुद्दा नहीं बना। जो सड़कें बनीं, वह भी चंद दिन बाद ही उखड़ गईं।
सियासी इतिहास पर गौर करें तो 1977 में आपातकाल और कांग्रेस विरोधी लहर में जनता पार्टी के महमूद हसन सांसद बने।
कहीं जातिगत तो कहीं संवेदना की लहर
1980 में जाट-मुस्लिम एकता की लहर में हसन फिर बाजी मार गए।
1983 में पूर्व सीएम बनारसी दास ऐसी ही लहर से संसद पहुंचे। 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद सहानुभूति की लहर में सुरेंद्र पाल सिंह ने जीत दर्ज की।
1989 में बोफोर्स तोप घोटाले के कारण भ्रष्टाचार विरोधी लहर में जनता दल के सरवर हुसैन ने कांग्रेस को पटखनी दे दी।
लहर का असर 1991 में भी रहा। राम लहर ने मुद्दों को पीछे धकेल दिया और भाजपा के डॉ. छत्रपाल सिंह ने विजय पताका फहरा दी। 1996 और 1998 में भी यहां कमल खिला।
1999 में राम लहर कमजोर पड़ी लेकिन जातीय समीकरणों ने फिर भाजपा को जिता दिया।
2004 में कल्याण सिंह और 2009 में सपा से कमलेश बाल्मीकि जातीय समीकरण के बल पर ही विजयी हो गए। इस बार भी सभी दल जातिगत गुणा-भाग में जुटे हैं।
विकास कभी नहीं रहा जनप्रतिनिधियों की प्राथमिकता
बुलंदशहर के जनप्रतिनिधियों के लिए विकास कभी एजेंडा नहीं रहा। सहकारी कताई मिल हजारों लोगों को रोजगार देता था, लेकिन वह अर्से से बंद है। चुनाव में इसे किसी दल ने भी इसे प्राथमिकता में नहीं रखा।
द किसान सहकारी शुगर मिल पोंटी चड्ढा ग्रुप को बेची जा चुकी है। यह कब बंद हो जाए, कहा नहीं जा सकता। लघु उद्योग लगातार यहां बंद हो रहे हैं। सिकंदराबाद में सैकड़ों फैक्ट्रियां बंद हो चुकी हैं। खुर्जा का पॉटरी व्यवसाय दम तोड़ रहा है।
कमलेश बाल्मीकि 2009 में कल्याण के आशीर्वाद से सपा प्रत्याशी के तौर पर सांसद बने। उस समय बदहाल बिजली व्यवस्था दुरुस्त करने, पानी की किल्लत दूर करने, सड़कों का जाल बिछाने का दावा किया था लेकिन कोई बड़ी योजना नहीं ला सके। शपथ भी सही तरीके से नहीं लेने के कारण किरकिरी हुई थी।
संसद में 89 प्रतिशत मौजूदगी होने के बाद भी पूरे पांच साल में सिर्फ चार प्रश्न ही उठा सके और एक चर्चा में शामिल रहे। निष्क्रियता के आरोप के बाद उनका टिकट भी काट दिया था, लेकिन आखिरी वक्त में फिर से सपा ने टिकट थमा दया।
2009 में प्रदर्शन
कमलेश बाल्मीकि (सपा) 2,36,257
अशोक प्रधान (भाजपा) 1,70,192
राजकुमारी गौतम (बसपा) 1,42,186
देवी दयाल (कांग्रेस) 1,00,065
खास क्या: इनके अलावा बारह प्रत्याशी मैदान में थे लेकिन कोई भी पांच हजार का आंकड़ा छू नहीं सका।
चुनावी समर के योद्धा
समाजवादी पार्टी ने इस बार कमलेश बाल्मिकी को टिकट दिया है। वे 2009 के चुनाव में सांसद बने। सपा ने इस बार भी भरोसा जताया है।
तरकश के तीर : दलित, ब्राह्मण, मुस्लिम, पिछड़े वर्ग के वोटरों के साथ कर्मचारियों, किसानों, छात्र-छात्राओं के बल पर नैया पार लगाने की कोशिश।
आम आदमी पार्टी डॉ राहुल दीपांकर को प्रत्याशी बनाया है। वे अमेरिका में डॉक्टर है। अब यहां आकर चुनाव में किस्मत आजमा रहे हैं।
तरकश के तीर : केजरीवाल की लोकप्रियता और आप की भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम के बल पर फतह करने का प्रयास।
ये भी हैं मैदान में
रालोद ने आगामी लोकसभा चुनावों में अंजू मुस्कान को प्रत्याशी बनाया है। कांग्रेस से गंठबंधन के बाद चौ. अजित सिंह ने एक बार फिर पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति में मजबूती से उभरे हैं। हालांकि अंजू पहली बार कोई चुनाव लड़ रही हैं।
तरकश के तीर : दलित वर्ग से ताल्लुक होने के कारण इस वर्ग के वोट बैंक में सेंध लगाने की तैयारी। मुस्लिम से शादी के कारण उनके वोटों को भी अपने पक्ष में लामबंद करने की कोशिश। चौ. अजित सिंह के नाम व जाट आरक्षण के नाम पर जाट वोटरों को भी लुभा रही हैं।
बसपा ने प्रदीप जाटव को टिकट दिया है। बसपा के मंडल और जिला संगठन में जिम्मेदारी निभाने का लंबा अनुभव। एक साल से लगातार जनता के संपर्क में।
तरकश के तीर : बसपा के बोट बैंक (दलित), मुस्लिम, पिछड़े वर्ग के अलावा कें द्र और प्रदेश सरकारों की नाकामी को उजागर कर लोगों को साथ जोड़ने की कोशिश।
भाजपा ने डॉ भोला सिंह को टिकट दिया है। वे एक बार शिकारपुर से रालोद से विधानसभा का चुनाव लड़ा लेकिन हार गए। जिला पंचायत का चुनाव भी हार चुके हैं। अब भाजपा ने सांसदी की लड़ाई में उतारा है।
तरकश के तीर : यूपीए सरकार की नाकामी, भाजपा के विकास के दावे, पार्टी के परंपरागत वोट, मोदी की लोकप्रियता को भुनाने की कोशिश।