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इतना भी आसान नहीं है मोदी के इस सपने को हकीकत में बदलना

Fri, 28 Aug 2015 02:40 AM IST
हिमांशु मिश्र/ अमर उजाला, नई दिल्ली
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मोदी सरकार ने स्मार्ट सिटी के सपने को हकीकत की पटरी पर दौड़ाने के लिए पहल तो कर दी है, मगर यह इतना आसान भी नहीं है।
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खासतौर से उन राज्यों को स्मार्ट सिटी योजना के प्रावधानों को पूरा करना आसान नहीं होगा, जो पहले से ही आर्थिक तंगी की दौर से गुजर रहे हैं।

दरअसल इस योजना के तहत न केवल राज्य सरकारों को केंद्र के बराबर रकम खर्च करनी होगी, बल्कि शहरी स्थानीय निकायों को भी बराबर की भागीदारी निभानी होगी।

करनी पड़ेगी जेब ढीली

इसके अलावा सबसे बड़ी बात इस योजना के लिए निवेशकों की तलाश भी होगी, जिसे ढूंढने की जिम्मेदारी भी राज्यों पर होगी। फिर स्मार्ट सिटी में रहन सहन के बेहतर होने की बात तो की जा रही है, मगर यह भी बड़ी सच्चाई है कि कचरा प्रबंधन, परिवहन सहित कई अन्य क्षेत्र निजी हाथों में होने के कारण ऐसे स्मार्ट सिटी में रहने वाले लोगों को अपनी जेबें ज्यादा ढीली करनी होगी।

उल्लेखनीय है कि इस योजना के तहत हर स्मार्ट सिटी के लिए राज्यों को शहरी स्थानीय निकायों के साथ एसवीपी (कंपनी) का निर्माण करना होगा। यही कंपनी न केवल स्मार्ट सिटी का दो करोड़ में मॉडल तैयार करेगी।

इसके बाद इसकेलिए फंड जुटाने की कवायद शुरू होगी। माना जा रहा है कि निजी क्षेत्र उन गरीब राज्यों के तहत आने वाले स्मार्ट सिटी की तुलना में पहले से सुविधासंपन्न शहरों वाले अमीर राज्यों में निवेश करने में ही रुचि दिखाएगी

पांच साल में 500 करोड़

इसलिए माना जा रहा है कि देर सबेर फिलहाल स्मार्ट सिटी की सूची में शामिल कई शहरों की को इस सूची से बेदखल होना पड़ेगा।

इस योजना के तहत केंद्र सरकार एक स्मार्ट सिटी के लिए पांच साल में 500 करोड़ रुपये देगी। इतनी ही रकम का जुगाड़ राज्य सरकारों और स्थानीय शहरी निकायों को करना होगा।

चूंकि इतनी रकम में किसी शहर को स्मार्ट सिटी बनाया जाना मुमकिन नहीं है, ऐसे में इसकेलिए भारी भड़कम निवेश करने वालों की तलाश करनी होगी।
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है भारी खर्चा

सरकार ने फिलहाल स्मार्ट सिटी का प्रोजेक्ट तैयार करने के लिए 2-2 करोड़ रुपये जारी करने की घोषणा की है। मंत्रालय केसूत्रों का कहना है कि प्रोजेक्ट रिपोर्ट तैयार करने के दौरान ही स्मार्ट सिटी बनाने के लिए भारी भड़कम रकम की जरूरत का अहसास होते ही कई गरीब राज्य इससे दूरी बनाना शुरू करेंगे।

चूंकि स्मार्ट सिटी में उपलब्ध ज्यादातर सुविधाएं सरकारी की जगह निजी क्षेत्रों द्वारा उपलब्ध कराई जाएंगी। ऐसे में कचरा प्रबंधन, सीवर प्रबंधन, बिजली, पानी के क्षेत्र में मामूली खर्च करने के आदी लोगों को इस मद में भारी रकम खर्च करनी होगी।

फिर स्मार्ट सिटी की परिकल्पना में अपशिष्ट जल का सौ फीसदी उपचार, सौ ऊर्जा, जल संरक्षण जैसी व्यवस्था पर भी भारी रकम खर्च होनी है और इसे परोक्ष या सीधे यहां रहने वाले लोगों को ही वहन करना होगा।
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