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इसलिए जरूरी है वर्तमान आईटी कानून में बदलाव

Fri, 30 Nov 2012 08:02 AM IST
नई दिल्ली/इंटरनेट डेस्क
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कानून की धारा 66 ए की शब्द रचना काफी व्यापक और अस्पष्ट है। इस धारा में झूठे और आपत्तिजनक संदेश भेजने पर सजा का प्रावधान है। लेकिन यह संदेशों की व्याख्या करने में अक्षम है। ऐसे में इसका गलत इस्तेमाल संभव है। इसलिए यह संविधान के अनुच्छेद 14, 19 (1) (ए) और अनुच्छेद 21 के अनुरूप नहीं है। अगर अभिव्यक्ति की आजादी के बारे में आपराधिक कानून पर अमल से पहले न्यायिक मंजूरी को जरूरी नहीं बनाया गया तो अंकुश लगाने के लिए इसका दुरुपयोग हो सकता है।
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आईटी कानून की धारा (66) ए
-इलेक्ट्रॉनिक मेल के जरिए अपमानजनक संदेश भेजना।
-ऐसा कोई भी इलेक्ट्रॉनिक संदेश जो कि अपमानजनक और डरावना हो।
-ऐसी कोई गलत जानकारी जिससे अपमान हो, खतरा बढ़े या मुसीबत आए।
-किसी को असुविधा हो।
-प्राप्तकर्ता के साथ धोखा हो या उसे भटकाया जाए।
-अगर दोष साबित हो जाता है तो तीन साल की जेल और जुर्माने का प्रावधान है।

कानून का दुरुपयोग
-अप्रैल 2012 में पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का कार्टून सोशल नेटवर्किंग साइटों पर पोस्ट करने के आरोप में जादवपुर यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर अंबिकेश महापात्र गिरफ्तार।
-मई 2012 को मुंबई पुलिस ने एयर इंडिया के वी जगन्नाथराव और मयंक शर्मा को फेसबुक और आरकुट पर ट्रेड यूनियन नेता और कुछ राजनीतिज्ञों के खिलाफ टिप्पणियां करने पर गिरफ्तार किया।
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-अक्टूबर 2012 में पुडुचेरी पुलिस ने बिजनेसमैन रवि श्रीनिवासन को ट्विटर पर पी चिदंबरम के बेटे कार्ति के खिलाफ टिप्पणी पर गिरफ्तार किया।
-नवंबर 2012 में बाल ठाकरे के निधन पर मुंबई बंद के खिलाफ टिप्पणी करने पर दो युवतियों और एक किशोर की गिरफ्तारी।
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