ईरान और विश्व की प्रमुख शक्तियों के बीच हुए परमाणु समझौते के बाद ईरान कई देशों के साथ सामान्य संबंध बना सकता है। इस समझौते पर पहुंचने से पहले और उसे कमज़ोर कर देने वाले प्रतिबंधों के बावजूद भारत उन कुछ देशों में से था, जो ईरान के साथ अरबों डॉलर का व्यापार कर रहे थे।
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प्रतिबंध उठाए जाने का भारत पर महत्वपूर्ण असर पड़ेगा, जिसे उम्मीद है कि वह ईरान के साथ आर्थिक और रणनीतिक सहयोग एक बार फिर मजबूत कर सकेगा। हालांकि भारतीय व्यवसायियों को चिंता है कि अब ईरान सख़्त रवैया अपना सकता है या फिर ज़्यादा सक्षम अंतरराष्ट्रीय देशों के पास जा सकता है।
बीबीसी संवाददाता अंबरसन एथिराजन ने भारत पर पड़ने वाले असर और आर्थिक हितों की पड़ताल की.भारत और ईरान के बीच मौजूदा दोतरफा व्यापार क़रीब 14 बिलियन डॉलर (8.90 खरब रुपए से ज़्यादा) है। व्यापार संतुलन ईरान के पक्ष में बहुत ज़्यादा है। पिछले साल ईरान को भारतीय निर्यात करीब 4.2 बिलियन डॉलर (26.65 अरब रुपए से ज़्यादा) था।
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डॉलर में करना होगा भुगतान
भारत ईरान से मुख्य रूप से तेल खरीदता है, प्रतिबंधों की वजह से यह प्रभावित हुआ था। इन प्रतिबंधों के चलते भारत ईरान को भारतीय खातों में रखे भारतीय रुपए से भुगतान कर रहा था। दरअसल अब भी भारत पर ईरान का करीब 6 बिलियन डॉलर (38.07 अरब रुपए से ज़्यादा) का भुगतान बकाया है।
दुनिया में तेल का सबसे बड़ा और चौथा उपभोक्ता भारत अब ईरान से तेल आयात करने के लिए आज़ाद है, लेकिन उसे अब इसके लिए डॉलर में भुगतान करना होगा। ईरान से सामान मंगाना या भेजना इस समय महंगा पड़ता है क्योंकि परिवहन लागत ऊंची है. भारत को उम्मीद है कि प्रतिबंध हटने से कंपनियों के लिए परिवहन आसान हो जाएगा।
भारत ईरान को ऑटोमोबाइल पुर्जे, उपकरण, मोटर और रसायन निर्यात करता रहा है.प्रतिबंध हटने के बाद लंबे समय में भारत को ईरान के साथ संबंधों का फ़ायदा मिलने की उम्मीद है, लेकिन कुछ व्यवसायियों की आशंका है कि कुछ क्षेत्रों पर तगड़ी मार पड़ेगी.भारतीय निर्यात संगठनों के संघ के महानिदेशक अजय सहाय कहते हैं, "भारतीय निर्यातकों को पूर्वी यूरोपीय उत्पादकों से प्रतियोगिता करनी पड़ेगी जो हाथ के औज़ार और गाड़ियों के सस्ते पुर्ज़े बनाते हैं।
ईरान करेगा कड़ी सौदेबाजी
चूंकि पिछले कुछ सालों में यूरो की क़ीमत कम हुई है, हमें यूरोपीय
उत्पादकों से कड़ी प्रतियोगिता करनी पड़ रही है।"भारत में चिंता है कि अब
ज़्यादा मजबूत ईरान कड़ी सौदेबाज़ी करेगा क्योंकि उसके पास अब पूरी दुनिया
के तरह तरह के ग्राहक और साझेदार होंगे। भारतीय कंपनियों ने 2008 में ईरान
के फ़रज़ाद बी गैस क्षेत्र में तेल और गैस की खोज की थी।
वे वहां उत्पादन
सुविधा का विकास करने में अब तक सौ मिलियन डॉलर लगा चुके हैं. लेकिन
प्रतिबंधों के कारण उत्पादन रुक गया था।
सालों की हिचकिचाहट के बाद परमाणु
समझौते होने और प्रतिबंध हटाने की संभावना होते ही भारत ने इस प्रोजेक्ट पर
चर्चा के लिए एक जल्दबाज़ी में एक प्रतिनिधिमंडल भेजा, लेकिन ईरान में छपी
ख़बरों से पता लगता है कि ईरान ने भारत के प्रस्ताव को नकार दिया है. वह अब
इसकी नीलामी की योजना बना रहा है।
भारतीय कंपनियों के लिए होगी मुश्किल
अगर टेंडर प्रक्रिया को अपनाया गया तो भारतीय कंपनियों के लिए फ्रांसीसी, अमरीकी और चीनी तेल कंपनियों से मुकाबला करना मुश्किल होगा। उन कंपनियों के पास काफ़ी मात्रा में संसाधन और आधुनिक तकनीक है. रूस और चीन ईरान के समर्थक रहे हैं और अब अपनी साख को आर्थिक और व्यवसायिक लाभ में बदलने की कोशिश करेंगे।
भारत ने 233 मिलियन डॉलर के एक समझौते पर दस्तख़त किए हैं, जो ईरानी रेलवे के लिए 1,50,000 टन से ज़्यादा के रेलवे ट्रैक निर्यात करने का है. लेकिन यह सौदा संकट में फंस गया है क्योंकि ख़बरें हैं कि ईरान इस सौदे की क़ीमत कम करना चाहता है क्योंकि यूरो की कीमत डॉलर के मुकाबले कम हो गई हैं।
ईरान यह भी कहता है कि एक बार प्रतिबंध हट गए तो उसे तुर्की जैसे दूसरे देशों से बेहतर प्रस्ताव मिलेंगे. भारत ने कथित रूप से पूरी परियोजना के लिए एक ख़ास प्रक्रिया के तहत पैसे की व्यवस्था करने की भी बात कही है.हालांकि भारतीय व्यवसायियों के लिए सिर्फ़ अंधेरा और निराशा ही नहीं है।
निर्यातकों का कहना है कि भारतीय कंपनियां अल्पकाल में भले ही हार जाएं, लेकिन भविष्य में उनके लाभ कमाने की गुंजाइश है. भारत ईरान का सबसे बड़ा चावल निर्यातक है और यह चीनी और सोयाबीन जैसे अन्य कृषि उत्पादों का निर्यात भी बढ़ा सकता है। भारत की दवा और आईटी कंपनियां भी अपना व्यवसाय बढ़ा सकती हैं।
सहाय कहते हैं, "भारत के कई बड़े दवा और कपड़ा व्यवसायी ईरान के साथ सौदा नहीं करना चाहते थे. उन्हें प्रतिबंधों का डर था. अब वह ईरान के साथ मुक्त रूप से सौदा कर सकते हैं और वहां निवेश कर सकते हैं। इसलिए यह भारतीय निर्यातकों के लिए बड़ा प्रोत्साहन होगा।"
मध्य एशिया के प्रवेश द्वार के रूप में ईरान की रणनीतिक स्थिति भारत के लिए महत्वूर्ण है. वह इस क्षेत्र में अपने पैर जमाना चाहता है। दोनों देशों के बीच दक्षिणी ईरान में चारबहार बंदरगाह को विकसित करने का समझौता हुआ है.भारतीय कंपनियां बंदरगाह में दो मौजूदा बर्थ (लंगर डालने का स्थान) को पट्टे पर लेंगी और उन्हें कंटेनर और बहु-उपयोगी कार्गो टर्मिनल के रूप में चलाने के लिए तैयार करेंगी।
एक बार चालू होने के बाद उम्मीद की जा सकती है कि मध्य एशिया के लिए नया व्यापार मार्ग खुलेगा। वॉशिंगटन में ब्रूकिंग्स इंस्टीट्यूट की तन्वी मदान कहती हैं, "पाकिस्तान के रास्ते मध्य एशिया के लिए ज़मीनी रास्ता न होने से चारबहार बंदरगाह के रास्ते सड़क और रेलमार्ग भारत के लिए महत्वपूर्ण है।
यह मध्य एशिया और अफ़गानिस्तान के लिए व्यापारिक मार्ग खोलेगा। इन देशों तक सड़क और रेल मार्ग के ज़रिए सामान पहुंचाने में यह बंदरगाह भारत के लिए मददगार होगा. पहले भारत के पास इस तरह की पहुंच नहीं रही है।"