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'मोदी खुद को चायवाला बताते हैं लेकिन वह तो खूनवाले हैं'

Sat, 08 Mar 2014 12:43 PM IST
सुदीप ठाकुर/अमर उजाला, नई दिल्ली
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लंबे समय से तेलंगाना आंदोलन से जुड़े रहे नक्सल समर्थक कवि वरवर राव आंध्र प्रदेश के पुनर्गठन से अस्तित्व में आ रहे नए राज्य तेलंगाना को सिर्फ एक भौगोलिक इकाई मानते हैं। एक दशक पहले सरकार और माओवादियों के बीच वार्ता की कोशिशों से जुड़े रहे राव फिलहाल बातचीत की कोई संभावना नहीं देखते। मगर वह मानते हैं कि भारतीय संविधान में ऐसे मुद्दे समाहित हैं, जिन्हें लेकर लोकतांत्रिक लड़ाई लड़ी जा रही है। नरेंद्र मोदी के उभार को वह हिंदुत्व के उभार के रूप में ही देखते हैं और आम आदमी पार्टी को वह दक्षिणपंथी पार्टी मानते हैं। इन्हीं मुद्दों पर सुदीप ठाकुर से उनकी बातचीत:
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प्रश्न 1. आंध्र प्रदेश के पुनर्गठन को आप किस तरह देख रहे हैं? खासकर इसलिए क्योंकि कभी माओवादियों का बड़ा आधार तेलंगाना में रहा है।

- तेलंगाना बनना तो ठीक है। 1969 में जब यह आंदोलन शुरू हुआ, तभी से हम इसका समर्थन कर रहे हैं। 1996 में हमने वारंगल में पृथक तेलंगाना के लिए बड़ा सम्मेलन भी किया था, जिसमें दो हजार डेलीगेट्स आए थे। उसके बाद हुई आम सभा में ढाई लाख से अधिक लोग आए। बड़ा जुलूस भी निकाला गया था। हम लोगों ने एक वारंगल डिक्लरेशन भी जारी किया था। इसमें इस बात का जिक्र था कि तेलंगाना का गठन किस तरह होना है। तबसे लेकर हम इस मूवमेंट में हैं। इसके लिए पहले तेलंगाना जनसभा बनी, फिर तेलंगाना यूनाइटेड फ्रंट का गठन किया गया। तेलंगाना प्रजा फ्रंट भी है। 1996 से लेकर अब तक इसके नेता रहे आकुलर बोमय्या की हाल ही में संदिग्ध परिस्थितियों में दुर्घटना में मौत हो गई। हम इल्जाम लगा रहे हैं कि उन्हें सरकार ने मारा है। हम 1969 से लेकर लगातार तेलंगाना मूवमेंट का मार्क्सवादी-लेनिनवादी और माओवादी नजरिये से समर्थन कर रहे हैं, क्योंकि हम यह समझते हैं कि 1956 में आंध्र प्रदेश के रूप में जब दोनों क्षेत्रों को मिलाया गया, उसके बाद असंतुलित विकास हुआ है। 1948 से पहले शेष आंध्र ब्रिटिश इंडिया में था और तेलंगाना हैदराबाद स्टेट में। यह हिस्सा सामंती और निरंकुश शासन के अधीन था, और वहां भूमि सुधार भी नहीं हो पाया। दूसरी ओर डेल्टा डिस्ट्रिक्ट में गोदावरी और कृष्णा नदियों में परियोजनाएं बनने से वहां जमीन उर्वर हुई है, फसलें अच्छी हुई हैं, जिससे एक नया सामाजिक वर्ग भी पनपा है।

प्रश्न 2. माओवादी पार्टी के अधिकांश बड़े नेता और काडर तेलंगाना से आते हैं। जैसा कि आपने कहा, माओवादी तेलंगाना की मांग का समर्थन भी करते रहे हैं। तेलंगाना के गठन के बाद क्या उनकी रणनीति में किसी तरह की तब्दीली आएगी?
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- अभी स्थिति वैसी ही है। हमने वारंगल डिक्लरेशन में जिस असंतुलित विकास की बात की है, वह अभी कायम है। असंतुलित विकास सामंतशाही का ही प्रतीक है। इसके खिलाफ हम डेमोक्रेटिक तेलंगाना के गठन के लिए लड़ते रहे हैं। अब जो तेलंगाना बन रहा है, वह तो ज्यॉग्राफिकल तेलंगाना ही है। हम जैसे लोगों की असली लड़ाई अब शुरू होती है। हम पहले से ही पोलावरम प्रोजेक्ट का विरोध कर रहे हैं। हम ऐसे प्रोजेक्टों का विरोध कर रहे हैं, क्योंकि इसमें आदिवासी लोग डूब रहे हैं। इनसे पर्यावरण को भी बड़ा खतरा है।

प्रश्न 3. इसी असंतुलित विकास के नाम पर तेलंगाना के पड़ोस में वर्ष 2000 में छत्तीसगढ़ को अलग राज्य बनाया गया। यदि सरकार के नजरिये से बात की जाए तो वहां माओवादी समस्या बढ़ी ही है। आप जिन मुद्दों को लेकर लड़ते रहे हैं, एक नया राज्य क्या उनके समाधान का कोई रास्ता है?

- नए राज्य में कुछ चीजें हो सकती हैं। मुमकिन है कि रोजगार की समस्या थोड़ी-बहुत हल हो जाए। स्टूडेंट्स की समस्याएं कुछ हद तक सुलझ सकती हैं। खासकर कुछ लोग पक्षपात के खिलाफ लड़ाई लड़ रहे थे, वह थोड़ा कम हो सकता है। लेकिन जो मूल मुद्दे हैं यानी आदिवासियों, दलितों और मुस्लिमों के मुद्दों के लिए फिर से लड़ना पड़ेगा। तेलंगाना राष्ट्र समिति आदिवासियों को 14 फीसदी और मुस्लिमों को चार फीसदी आरक्षण देने की बात कह रही है। मगर सरकार में आने के बाद वह ऐसा करती है या नहीं, यह देखना है। मगर हम इस मांग के समर्थन में प्रस्ताव लाने और उसे पारित करने के लिए दबाव बनाएंगे। आंध्र प्रदेश के विभाजन में तेलंगाना के लोगों को अलग राज्य दिया गया है और आंध्र के लोगों को पोलावरम प्रोजेक्ट पैकेज के रूप में दिया जा रहा है। जयराम रमेश ने राज्यसभा में कहा है कि यह मल्टीपरपज प्रोजेक्ट है। इसका मकसद सिर्फ डेल्टा जिलों को पानी देना नहीं है, बल्कि काकीनाडा से लेकर विशाखापट्टनम तक मल्टीनेशनल कंपनियों के साथ जो बड़ी इंडस्ट्रीज के लिए एमओयू हुए हैं, उन प्रोजेक्ट्स को भी पानी देना है। आदिवासी लोग डूब रहे हैं। आदिवासियों के डूब वाले जितने भी क्षेत्र हैं, वह तेलंगाना से निकालकर आंध्र को दिए जा रहे हैं, इसके लिए एक बिल लाया गया है, जो कि गैरकानूनी है।

प्रश्न 4. सरकारी और गैर सरकारी एजेंसियों का आकलन है कि देश के एक- तिहाई जिलों में माओवादियों का प्रभाव है। तेलंगाना, जिसे आप भौगोलिक इकाई कह रहे हैं या फिर उसके पड़ोस में छत्तीसगढ़ और ओडिशा जैसे राज्यों में माओवादियों का खासा प्रभाव है। क्या यह सही समय नहीं है, जब माओवादियों को मुख्यधारा में उतरकर चुनाव लड़ने के बारे में विचार करना चाहिए?

- नहीं, यह नहीं हो सकता। मैं जो कह रहा हूं इसका यह मतलब नहीं है कि ये मुद्दे सरकार में आने से हल हो जाएंगे।

प्रश्न 5. मगर आप इन मुद्दों को संसद में उठा सकते हैं...?

- हम इन मुद्दों के लिए डेमोक्रेटिक तरीके से ही लड़ सकते हैं। पार्टी का मुद्दा तो एक नई जनवादी क्रांति लाना है। नई जनवादी क्रांति के लिए पार्टी का अपना एक प्रोग्राम है। उसमें मास स्ट्रगल और आर्म्स स्ट्रगल होता है। जैसा कि दंडकारण्य में देख सकते हैं। इसमें आगे जाकर जनसरकार भी बनाई जाती है, सरकार द्वारा लिए जाने वाले टैक्स और चुनावों का विरोध किया जाता है। तेलंगाना का गठन तो केवल एक प्रशासनिक व्यवस्था है, पार्टी इसके लिए चुनाव में शामिल नहीं होगी।

प्रश्न 6. मगर चुनावों के दौरान कहा जाता रहा है कि ऐन वक्त पर माओवादी किसी खास पार्टी या कुछ खास उम्मीदवारों का रणनीतिक आधार पर समर्थन करते हैं।

- मैं ऐसा नहीं मानता। माओवादी पार्टी तो चुनावों का बहिष्कार करती है, लेकिन हो सकता है कि माओवादियों के साथ जो संघर्ष करने वाले लोग होते हैं वे अपनी इच्छा से ऐसा करते हों। माओवादी पार्टी का स्टैंड है चुनाव बहिष्कार। दूसरी बात यह कि वोट हो सकता है कि उत्पीड़न के विरोध में या इस आधार पर हो कि कौन अधिक सेक्यूलर है, तो संभव है कि लोग ऐसे व्यक्ति को वोट दें जो माओवादियों के प्रति सहानुभूति रखता हो। इन बातों में दम नहीं है, क्योंकि यह पार्टी का स्टैंड नहीं है।

प्रश्न 7. आपका परिवार कांग्रेस से जुड़ा रहा है और आपने खुद देश की राजनीति और चुनावों को करीब से देखा है। चुनाव घोषित हो चुके हैं और भ्रष्टाचार और सांप्रदायिकता को मुद्दा बनाया जा रहा है। आप किसे बड़ा मुद्दा मानते हैं?

- मेरी मां और भाई कांग्रेस से जुड़े थे। मगर यह दूसरी बात है, लेकिन जबसे मुझे वोट का हक मिला, तबसे तो मैं नक्सलवादी हूं। हमारी चुनावों में दिलचस्पी नहीं है, हमने बहिष्कार किया है। मगर यह बात जरूर है कि मोदी (नरेंद्र मोदी) हिंदुत्व वाले हैं। वह खुद को चायवाला बताते हैं लेकिन वह तो खूनवाले हैं। उनके पिता चायवाले थे और वह प्लेटफॉर्म में चाय लाकर बेचते थे। वह कहते हैं कि एक चायवाला भी प्रधानमंत्री बन सकता है। 13 वर्ष की उम्र में वह आरएसएस में शामिल हुए थे, तबसे लेकर आज तक वह आरएसएस के कट्टर सदस्य हैं। वह राजनीति में चायवाला होने के कारण नहीं, बल्कि आरएसएस में होने के कारण आए हैं। दंगे में शामिल होने के कारण आए हैं। दूसरी बात वह ओबीसी कार्ड (बैकवर्ड) इस्तेमाल कर रहे हैं। 1991 में मंडल कमीशन की सिफारिशें जब आई थीं, तब इन्हीं लोगों ने उसका विरोध किया था। आज की स्थिति भी देखिए कि यदि वह ओबीसी की भलाई चाहते हैं, तो वह नर्मदा बांध के सामने सरदार पटेल की मूर्ति क्यों लगा रहे हैं, ज्योतिबा फुले की मूर्ति क्यों नहीं लगाते। नर्मदा बांध के कारण आदिवासी डूबे हैं। उनका विकास कार्यक्रम अडानी और अंबानी का विकास कार्यक्रम है। वह शौचालय की बात करते हैं, मगर अहमदाबाद में आज भी 12 हजार लोग सिर पर मैला ढोते हैं। वहां हिंदू और मुस्लिम की अलग बस्तियां बन गई हैं।

प्रश्न 8. आम आदमी पार्टी का जो तौर-तरीका है, उसके बारे में कहा जाता है कि यह छापामार या गुरिल्ला तरीका है। कई बार उनका व्यवहार अल्ट्रा लेफ्ट जैसा भी लगता है। इस पार्टी को आप किस तरह देखते हैं?

- नहीं, वह अल्ट्रा राइट है। वह एक राजनीतिक पार्टी है जिसका एक शहरी चरित्र है। समस्या यह है कि वह जड़ में नहीं जाती। भ्रष्टाचार की जड़ पूंजीवादी व्यवस्था में है। पूंजीवाद में कमीशन को गैरकानूनी और अनैतिक नहीं माना जाता। बोफोर्स का जब सौदा हुआ था, उस समय स्वीडिश सरकार का यह मानना था कि राजीव गांधी ने जब इतना बड़ा सौदा किया है, तो उन्हें हम कमीशन क्यों न दें। एक वकील जब हमारा केस लड़ता है तो फीस लेता है, उसी तरह जब कोई प्रोजेक्ट दिलाए तो उसे कमीशन मिलता है। हमारी तीसरी दुनिया इसे रिश्वत मानती है, लेकिन पूंजीवादी विश्व उसे काम के बदले कमीशन मानता है। हमारे देहातों में आज भी पानी बेचना, दूध बेचना गलत समझा जाता है। आदिवासी तो दूध पीना भी गलत समझते हैं। पूंजीवादी व्यवस्था में करप्शन ही कमीशन कहा जाता है।

प्रश्न 9. मगर माओवादियों के कॉरपोरेट के साथ रिश्तों के भी आरोप लगे हैं...

- यह बिल्कुल गलत बात है। माओवादी कॉरपोरेट सेक्टर से एक पैसा भी नहीं ले रहे हैं। कॉन्ट्रेक्टर से वे लेवी लेते हैं, उसमें छिपाने का कुछ नहीं है।

प्रश्न 10. सोनी सोरी का जो मामला है, उनके आम आदमी पार्टी से चुनाव लड़ने की बात की जा रही है, उन पर जो आरोप लगे हैं...

- वह तो कभी भी माओवादियों के साथ नहीं थी। उसके पिता पर हमला भी किया गया है। पुलिस ने उस पर दबाव डालकर बयान दिलवाया।

प्रश्न 11. आपने वर्ष 2002 में आंध्र सरकार और माओवादियों के बीच बातचीत की पहल की थी। निकट भविष्य में आप ऐसी कोई संभावना देखते हैं क्या? क्या कोई ऐसा प्लेटफार्म बनेगा, जिसमें माओवादी और सरकार एक टेबिल पर बात करने के लिए आएं।

- अभी तो ऐसी स्थिति नहीं है। 2002 में चंद्रबाबू नायडू की सरकार (आंध्र प्रदेश) थी। मैं पार्टी का प्रतिनिधि था। मगर उनकी नीयत साफ नहीं थी, इसलिए बातचीत शुरू भी नहीं हुई। कांग्रेस की सरकार के समय जब वाईएसआर रेड्डी मुख्यमंत्री थे, ऐसी पहल हुई थी। वह चुनाव का मुद्दा था, चंद्रबाबू ने उसे रेफरेंडम भी कहा था। उस समय के आंध्र के गृहमंत्री चन्ना रेड्डी ने कोशिश भी की, सारी सिविल सोसाइटी चाहती थी कि बातचीत हो। सिर्फ वाईएसआर को छोड़कर बहुत से लोग चाहते थे कि बात हो। मगर अब ऐसी कोई संभावना नहीं है। आजाद के एनकाउंटर को आप देख सकते हैं। जैसा चंद्रबाबू ने यहां किया, वैसा चिदंबरम ने केंद्र में किया है। एक तरफ अग्निवेश को सामने रखकर वह कह रहे थे कि हम बातचीत को तैयार हैं। लेकिन श्रीकांत ने अग्निवेश को जो पत्र लिखा उसमें साफ है कि एक प्लान बनाकर आजाद को पकड़कर एनकाउंटर किया गया। उसके बाद श्रीकांत को मारने की भी साजिश की गई।

प्रश्न 12. अग्निवेश की भूमिका को आप किस तरह देखते हैं?

- मैंने भी उनसे कहा था कि इस तरह अकेले कोशिश करना ठीक नहीं। आंध्र में जो पहल हुई उसके पीछे एक कमेटी थी। उसमें पारदर्शिता थी। जंगल में बात करने के लिए भी चार लोग गए थे। उस कमेटी में 16 लोग थे। सरकार से मिलने आठ से कम लोग कभी नहीं गए।

प्रश्न 13. लेकिन जब सुकमा के डीएम एलेक्स पाल मेनन का अपहरण किया गया था या उससे पहले मलकानगिरी के डीएम का अपहरण किया गया, या ओडिशा में झीना हिकाका का अपहरण हुआ, ऐसे सब मामलों में तो माओवादियों और सरकार के बीच बातचीत तो हुई?

-अपहरण एक अलग चीज है। वह मांग का हिस्सा हो सकता है। वह तात्कालिक होता है। अपहरण के मुद्दे पर बातचीत और माओवादी मुद्दों पर बातचीत दो अलग चीजें हैं। टेबिल पर बात हो सकती है, जैसे संविधान में जो चीजें हैं उनकी मांगों को लेकर। जैसे भूमि सुधार से संबंधित कुछ एक्ट हैं, उन्हें लागू करने के लिए।

प्रश्न 14. आपने यह महत्वपूर्ण बात की है, भारतीय संविधान की। क्या आप भारतीय संविधान में यकीन करते हैं?

- नहीं, बात ऐसी नहीं है। 1857 से देश में जो लोकतांत्रिक संघर्ष चल रहा है, लोगों की जो आकांक्षाएं हैं उसको नकारते हुए संविधान लिखना संभव नहीं था। अंबेडकर ने ऐसे मुद्दे इसमें रखे। भारतीय संविधान की जो प्रस्तावना है, नीति निदेशक तत्व और मौलिक अधिकार हैं, वे इस देश के लोगों के लंबे लोकतांत्रिक संघर्ष का नतीजा हैं। इन्हें लागू करने के लिए टेबिल पर बात हो सकती है। मगर सरकार ऐसी चीजों के लिए भी तैयार नहीं। हमारे विश्वास की छोड़िए, सरकार तक को आज संविधान में विश्वास नहीं है। जर्मनी में सत्ता में आने के बाद हिटलर को पार्लियामेंट में विश्वास नहीं था, उसने उसे जला दिया। आज की संसद में देखें कैसे वहां सदस्य मिर्च पाउडर और चाकू लेकर पहुंच जाते हैं। पार्लियामेंट को खरीद लेने वाले लोग वहां हैं। देश को खरीदने की ताकत रखने वाले लोग पार्लियामेंट में बैठे हैं।

प्रश्न 15. आप चार दशक से भी लंबे समय से रेडिकल लेफ्ट में हैं। आपने देखा होगा कि किस तरह नक्सलबाड़ी से लेकर आज तक इस आंदोलन में भटकाव दिखता है, पार्टी कई बार टूटी है। कोंडापल्ली सीतारमैया और दूसरे नेताओं को पार्टी ने बाहर किया है, कुछ वर्ष पहले कानु सान्याल ने खुदकुशी कर ली, उससे पहले उन्होंने भी माओवादी आंदोलन से खुद को अलग कर लिया था। अभी जैसे गुडसा उसेंडी का मामला भी सामने आया। आप इसे किस तरह देखते हैं?

- माओ त्से तुंग ने कहा है कि यह एक लंबी यात्रा है। यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि सारे लोग अंत तक इस रेल में सफर करेंगे। कुछ लोग उतर जाएंगे, कुछ लोग फिर चढ़ेंगे। इसीलिए तो माओ ने कहा कि क्रांति में कुछ लोग कुछ दिन रह सकते हैं, सारे लोग कुछ दिन रह सकते हैं, कुछ लोग कुछ और दिन रह सकते हैं, अंत तक रहना बहुत बड़ी बात है। यह कोई नई बात नहीं है। ऐसा कम हुआ कि जिसने क्रांति शुरू की वह उसके नतीजे देख सका, जैसे लेनिन और माओ ने देखा।
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