तमिलनाडु की पूर्व मुख्यमंत्री जे जयललिता राजनीतिक करियर के शीर्ष पर थीं। लोकसभा चुनाव में 37 सीटें और तमिलनाडु में सरकार, एआईएडीएमके के लिए स्वर्णिमकाल जैसा था।
भ्रष्टाचार के 18 साल पुराने मामले में बंगलौर की विशेष अदालत के फैसले ने न केवल जयललिता के राजनीतिक भविष्य पर प्रश्नचिन्ह लगा दिया है, एआईएडीएमके भी मुश्किल में पड़ गई है। हालांकि राजनीतिक जानकारों का मानना है कि जयललिता को खारिज करना जल्दबाजी होगी, वह वापसी कर सकती हैं।
जयललिता के खिलाफ आय से अधिक संपत्ति का मामला 1996 में दर्ज किया गया था। 18 साल चली कानूनी प्रक्रिया के बाद बंगलौर की विशेष अदालत ने उन्हें चार साल की सजा सुनाई और 100 करोड़ रुपए जुर्माना लगाया।
18 सालों के अंतराल में कई ऐसे दौर भी आए, जब लगा कि जयललिता के खिलाफ मुकदमा चलाना आसान नहीं है। वह तमिलनाडु की सबसे ताकतवर महिला थी, उन्हें अदालत के कठघरे में खड़ा करना मुश्किल था। हालांकि ये मुकदमा चला और जयललिता को सजा हुई।
न्याय की लड़ाई में कइयों की महत्वपूर्ण भूमिका रही। पढ़िए, ऐसी ही चार किरदारों के बारे में, जिन्होंने जयललिता को जेल की कालकोठरी में भेजने में मदद की।
सुब्रमण्यम स्वामी ने दर्ज कराया मुकदमा
डॉ सुब्रमण्यम स्वामी ने 1996 में जयललिता के खिलाफ आय से अधिक संपत्ति अर्जित करने का मुकदमा दर्ज कराया था। जयललिता 1991 से 1996 तक तमिलनाडु की मुख्यमंत्री रहीं। मुख्यमंत्री के रूप में वह मात्र एक रुपए महीने तनख्वाह लेती थीं।
1996 में स्वामी ने आरोप लगाया कि एआईएडीएमके नेता जयललिता की संपत्ति 1991 से 1996 के बीच में 22 गुना बढ़ गई है। 1991 में उनके पास तीन करोड़ रुपए की संपत्ति थी, जबकि 1996 में ये बढ़कर 66.65 करोड़ हो गई।
7 दिसंबर, 1996 को जयललिता को गिरफ्तार कर लिया गया। 1997 में चेन्नई की एक अदालत में जयललिता और तीन अन्य के खिलाफ मुकदमा शुरू हुआ।
हाईकोर्ट ने ठुकरा दी जयललिता की याचिका
तमिलनाडु की तत्कालीन राज्यपाल एम फातिमा बीवी ने जयललिता के खिलाफ मुकदमा चलाने का आदेश दिया था। जयललिता ने फातिमा बीवी के आदेश के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील की।
जयललिता की मांग की फातिमा बीवी के आदेश को निरस्त कर दिया जाए। हालांकि हाईकोर्ट ने जयललिता की याचिका रद्द कर दिया और मुकदमे का हरी झंडी दे दी।
जिस समय ये फैसला आया उस समय तमिलानाडु में डीएमके की सरकार थी और एम करुणनिधि मुख्यमंत्री थे। केंद्र में संयुक्त मोर्चा की सरकार थी और डीएमके उस सरकार की सहयोगी थी।
के अनबाझगन ने की अदालत बदले की मांग
2001 में एआईएडीएमके एक बार फिर सत्ता में आई और जयललिता दोबारा मुख्यमंत्री बनीं। हालांकि एक अन्य मामले में सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद उन्हें से हटना पड़ा था।
फरवरी, 2002 जयललिता ने मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली तो डीएमके के महासचिव के अनबाझगन सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका डाली और मांग की कि जयललिता के ऊपर चल रहे भ्रष्टाचार के मामले को तमिलानाडु के बाहर भेजा जाए। वह तमिलनाडु की मुख्यमंत्री हैं और राज्य में उनके ऊपर मुकदमा चलाना मुश्किल है।
सुप्रीम कोर्ट ने अनबझगन की याचिका पर 2003 में मुकदमे को बंगलौर शिफ्ट करने का आदेश दिया।
भवानी सिंह को बनाया मुकदमे को वकील
फरवरी, 2005 में कर्नाटक सरकार ने बीवी आचार्य को जयललिता के मामले में सरकारी वकील नियुक्त किया गया। अगस्त, 2012 में उन्होंने मुकदमा लड़ने के असमर्थता जता दी। कर्नाटक सरकार ने उसके बाद 2 फरवरी, 2013 को जी भवानी सिंह को वकील नियुक्त किया।
हालांकि कर्नाटक सरकार ने बिना कारण बताए 26 अगस्त 2013 को उन्हें मुकदमे से हटा दिया। सरकार ने कर्नाटक हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस से भी इस मामले सलाह-मशविरा नहीं किया था। मामला सुप्रीमकोर्ट पहुंचा। कोर्ट ने भवानी सिंह को वकील नियुक्त करने के आदेश दिया। जयललिता को सजा दिलाने में भवानी की दलीलों की भी अहम भूमिका रही।
हालांकि विशेष अदालत ने एक बार मुकदमे देरी के कारण भवानी पर ही जुर्माना लगा दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने ये जुर्माना रद्द कर दिया।