भारत-पाकिस्तान के बीच 15 जनवरी को होने वाली विदेश सचिव स्तर की वार्ता के टलने के आसार बढ़ गए हैं। वार्ता तभी होगी जब पाकिस्तान अपने वादे के मुताबिक पठानकोट आतंकी हमले के गुनाहगारों के लिए ठोस कार्रवाई की शुरुआत करेगा। मंगलवार को अपने पाकिस्तानी समकक्ष नवाज शरीफ से फोन पर हुई बातचीत में भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस आशय का स्पष्ट संदेश दे दिया था।
दरअसल इस बातचीत के दौरान नवाज बार-बार विश्वास बहाली के लिए वार्ताओं का दौर का क्रम न टूटने देने पर जोर दे रहे थे तो पीएम मोदी पठानकोट के गुनाहकारों के खिलाफ फौरी और कड़ी कार्रवाई पर।
पूरी बातचीत के दौरान पीएम मोदी ने एक बार भी नवाज के वार्ताओं का दौर जारी रखने पर कोई ठोस आश्वासन नहीं दिया। गौरतलब है कि इससे पहले राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (एनएसए) अजित डोभाल ने अपने पाकिस्तानी समकक्ष के समक्ष वार्ता से पहले पठानकोट हमले केगुनाहगारों के लिए प्रामाणिक कार्रवाई की शर्त रखी थी।
गेंद अब पाकिस्तान के पाले में
सरकारी सूत्र के मुताबिक विदेश सचिव स्तर की वार्ता मामले की गेंद अब पाकिस्तान के पाले में है। भारत इस मामले में पाकिस्तान की ओर से वार्ता से पहले हर हाल में ठोस कार्रवाई चाहता है। अगर शरीफ ने बिना किसी बहानेबाजी के कार्रवाई शुरू की, तभी बातचीत पर उम्मीद बंधेगी।
पाकिस्तान को हमले में उसके लोगों का हाथ होने संबंधी सबूत और सुराग उपलब्ध कराने के बाद भारत इस दिशा में उसकी ओर से भावी कार्रवाई का इंतजार कर रहा है। ऐसा न होने पर भारत विदेश सचिव स्तर की बातचीत को स्थगित कर देगा।
उक्त सूत्र के मुताबिक नवाज ने मंगलवार को प्रधानमंत्री को पूर्व तय कार्यक्रम के अनुरूप ही वार्ता जारी रखने की अपील की थी। उनका कहना था कि इससे दोनों देश आतंकवादियों को कड़ा संदेश दे सकेंगे।
हालांकि उन्हें पीएम मोदी की ओर से इस बारे में ठोस आश्वासन नहीं मिला। बातचीत के दौरान पीएम मोदी ने लगातार पठानकोट के गुनहगारों के लिए ठोस कार्रवाई को जरूरी बताया।
बातचीत टलने का एक बड़ा कारण
विदेश सचिव स्तर की बातचीत टलने का एक बड़ा कारण घरेलू राजनीति भी हो सकती है। सरकार के समक्ष घरेलू मोर्चे पर पाकिस्तान के समक्ष हथियार डाल देने के सियासी संदेश जाने का खतरा भी है।
इस हमले के बाद विपक्ष सरकार पर हमलावर है। ऐसे में सरकार चाहती है कि पाकिस्तान इस दिशा में ठोस कार्रवाई करे, जिससे उसे वार्ता के लिए आगे कदम बढ़ाने में आसानी हो।
खासबात यह है कि सरकार को इसी साल अप्रैल महीने में असम विधानसभा चुनाव से भी गुजरना है। ऐसे में सरकार रक्षात्मक होने या पाकिस्तान के समक्ष हथियार डालने का संदेश जाने नहीं देना चाहती।