28 जून, 1954 में चीनी प्रधानमंत्री चाऊ एनलाई का दिल्ली में वैसा ही स्वागत किया गया था, जैसा 17 सितंबर, 2014 को अहमदाबाद में चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग का किया गया।
तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने चीन प्रधानमंत्री से प्रभावित होकर 'हिंदी-चीनी, भाई-भाई' का नारा दिया था। कूटनीतिक जानकारों के मुताबिक, नेहरू ने चीन के साथ गहरी मित्रता का सपना देखा था।
नेहरू ने अमेरिका और कनाडा की तर्ज ही भारत और चीन के बीच खुली सीमा का प्रस्ताव दिया था। नेहरू का मानना था कि भारत और चीन के बीच खुली सीमा होगी तो दोनों मुल्कों का रक्षा बजट कम हो सकेगा। उस धन का इस्तेमाल राष्ट्र निर्माण में किया जा सकेगा।
हालांकि, चाऊ एनलाई ने नेहरू के सपनों पर पानी फेर दिया था। 1962 की सर्दियों में चीन ने भारत पर युद्घ थोप दिया, जिसमें भारत की हार हुई थी।
चीन पर किया जा सकता है भरोसा
1962 के युद्घ के बाद भारत और चीन के रिश्ते भी ठंडे पड़ गए। लंबे समय तक दोनों मुल्कों के बीच किसी भी प्रकार की बातचीत नहीं हुई। पिछली सदी के अंतिम दशक मे दोनों देशों के रिश्तों पर जमीं बर्फ पिघलनी शुरू हुई थी।
बुधवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जन्मदिन के दिन ये बर्फ पिघलकर साबरमती नदी में बह गई। साबरमती रीवरफ्रंट पर चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग का भव्य स्वागत किया गया।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने साबरमती रीवरफ्रंट पर जिनपिंग के साथ लंबी गुफ्तगू की। उन्होंने सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आंनद उठाया। चीनी राष्ट्रपति को गुजराती थाली परोसी गई, जिसमें 100 से अधिक व्यंजन थे।
हालांकि बुधवार को चीन ने कई ऐसी हरकतें भी कि जिससे उसके चरित्र पर भरोसा करना एक बार फिर मुश्किल लगा रहा है।
चुमार में घुसे और 100 चीनी सैनिक
बुधवार को चीनी राष्ट्रपति के भारत पहुंचने से चंद घंटे पहले तकरीबन 100 चीनी जवान लद्दाख के चुमार सेक्टर में घुस गए। उस इलाके में पहले से ही लगभग 300 चीनी सैनिकों ने डेरा जमा रखा था।
बुधवार को उन्हीं सैनिकों की वापसी के लिए ब्रिगेडियर स्तर की फ्लैग मीटिंग हुई थी। उस मीटिंग का नतीजा तो नहीं निकला, सैनिकों का आमद जरूर बढ़ गई।
चीनी सेना के इन्हीं जवानों ने पिछले सप्ताह चुमार सेक्टर में घुसकर 100 भारतीय जवानों को घेर लिया था, जिसके बाद दोनों देश की सेना आमने-सामने आ गई थी।
मंगलवार को उन सैनिकों में से कुछ सैनिक वापस लौट गए थे, जिसके बाद ये लगा था कि चीनी सेना पीछे हट रही है। लेकिन बुधवार को 100 और सैनिकों के आने के बाद हालात फिर बिगड़ गए। चीनी सेना के इसी रवैये के कारण चीन की मित्रता पर भरोसा नहीं हो पाता।
सामारिक ही नहीं व्यापारिक प्रतिद्वंद्वी भी
ऐसा नहीं की चीन केवल सामरिक प्रतिद्वंद्वी ही है। चीन अतंराष्ट्रीय स्तर पर भारत को व्यापारिक मामलों में पछाड़ने को कोशिश भी करता रहा है। एशियाई उपमहाद्वीप में ये प्रतिद्वंद्विता अक्सर दिखती है।
चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने सोमवार को भारत के पड़ोसी देश मालदीव की यात्रा की थी। उस यात्रा के बाद मालदीव ने राजधानी माले में एक हवाई अड्डे को अपग्रेड करने का ठेका चीनी कंपनी को दे दिया, जबकि लगभग 511 मिलियन डॉलर का ये ठेका पहले भारतीय कंपनी जीएमआर को दिया गया था। दो साल पहले उसे रद्द कर दिया गया।
चीन, श्रीलंका में एक बंदरगाह भी बना रहा है। चीन ने हिंद महासागर में अपने व्यापारिक हितों को बढ़ावा देने के लिए 'मेरीटाइम सिल्क रूट' प्रोजेक्ट पर काम कर रहा है। प्रोजेक्ट के तहत चीन हिंद महासागर के देशों को बंदरगाहों का निर्माण कर समुद्र मार्गों से जोड़ना चाहता है। श्रीलंका और मालदीव ने प्रोजेक्ट में शामिल होने के तैयार भी हो गए हैं।
जबकि भारत प्रोजेक्ट को अपने हित में नहीं मानता। भारत 'मेरीटाइम सिल्क रूट' न आर्थिक हितों के लिए मुफीद मानता है ना सामरिक हितों के। ऐसे प्रोजेक्टों के होते हुए चीन पर भरोसा करना कितना ठीक है?