प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जिस काम को हाथ में लेते हैं वो चाहे सफल हो या न हो लेकिन उसे अपनी विशिष्ट कार्यशैली और अलग अंदाज के चलते एक अलग पहचान दिलाने में जरूर सफल हो जाते हैं। गांधी जयंती के अगले दिन से शुरू हुआ मन की बात कार्यक्रम भी मोदी का एक ऐसा ही आयोजन रहा।
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जिसमें उन्होंने आम जनता तक जुड़ने के लिए हाशिये पर पहुंच चुके सबसे पुराने संचार माध्यम रेडियो को चुना। तब से अब तक मोदी लगातार अमूमन हर माह ही जनता से अपने मन की बात करते हैं। न्यूज चैनलों-अखबारों और विभिन्न संचार माध्यमों पर यकीन करें तो मोदी के इस कार्यक्रम को लोग बड़े चाव से सुनते हैं, खासकर ग्रामीण तबकों में मोदी की 'मन की बात' को ज्यादा गंभीरता से लिया जाता है।
लेकिन, क्या यही सत्य है....? क्या सच में मोदी लोगों तक अपने मन की बात पहुंचा पाए हैं? क्या समाज के वंचित तबके का वो आखिरी व्यक्ति मोदी के मन की बात सुन पाता है जिसके लिए वह अपनी चहेती इलेक्ट्रोनिक मीडिया और अखबारों की हेडलाइन को छोड़कर रेडियो पर आए। ठहरिए, इस मुद्दे पर अपनी राय बनाने से पहले एक बार पड़ताल कर लेते हैं उन कारणों की जो मोदी के इस पसंदीदा आयोजन की सफलता पर कुछ सवाल खड़े करते हैं।
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अमेरिका से शुरू हुई जनता से बातचीत की परंपरा
रेडियो पर मन की बात करने का कांसेप्ट काफी पुराना है। कई विकसित देशों में राष्ट्राध्यक्ष लोगों तक अपनी बात पहुंचाने और उनसे सीधे जुड़ाव के लिए रेडियो पर इस तरह के आयोजन करते रहते हैं।
दुनिया के सबसे विकसित राष्ट्र अमेरिका में इसकी एक लंबी प्रथा रही है जहां राष्ट्रपति जनता तक अपनी बात पहुंचाने के लिए रेडियो पर अपनी बात रखने के साथ ही जनता से सवा-जवाब करते रहे हैं। माना जाता है वहां इसकी शुरूआत अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति फ्रेंकलिन डी रुजवेल्ट के समय 1933 के आसपास रेडियो पर 'फायरसाइड चैटस' से हुई थी। प्रथम विश्वयुद्ध की पृष्ठभूमि में शुरू हुआ उनका यह कार्यकम लगभग एक दशक तक चला।
उस दौर में रुजवेल्ट की खनकदार आवाज रेडियो पर सुनने का लोग बेसब्री से इंतजार करते थे। आम जनता से सीधे जुड़ाव के इस प्रयास ने रूजवेल्ट को काफी प्रसिद्िध दिलाई। हालांकि रुजवेल्ट इस प्रयोग को इससे पूर्व न्यूयार्क के मेयर रहने के दौरान भी इस्तेमाल कर चुके थे, जिसने उन्हें उस समय भी काफी ख्याति दिलाई थी।
रुजवेल्ट के बाद से शुरू हुआ रेडियो पर बातचीत का यह दौर आज तक बदस्तूर जारी है। अमेरिका के अलावा और भी कई राष्ट्राध्यक्ष का आम जनता से बातचीत का यह कार्यक्रम उनके देशों में काफी लोकप्रिय है।
कहां तक है आज रेडियो की उपलब्धता
खैर, बात प्रधानमंत्री मोदी की और उनके 'मन की बात' कार्यक्रम की हो रही थी। रेडियो पर लगभग हर माह होने वाले इस आयोजन के पीछे एक बड़ा सवाल यह भी है कि मोदी जिन तक अपनी बात पहुंचाना चाहते हैं क्या ये संदेश वहां तक पहुंच भी पा रहा है?
पहला और मूल सवाल तो यही है कि संचार माध्यमों की भीड़ में रेडियो की मौजूदगी आज कहां तक है। कितने घरों और कितने लोगों के पास रेडियो मौजूद हैं। अगर हम इस सवाल का जवाब अपने आसपास ही तलाश करें तो हकीकत सामने आ जाती है।
शायद ही किसी घर में आज पुराना रेडियो (या शायद पुराने दौर का ट्रांजिस्टर) मिल पाता हो, तो फिर मोदी का संदेश सुनेगा कौन। हालांकि एक उलटबांसी ये भी है कि जहां रेडियो अपना वजूद खो बैठा है वहीं एफएम चैनलों की संख्या सैकडों में पहुंच चुकी है। लेकिन उसका बड़ा कारण है मोबाइल। और मोबाइल कान पर लगाकर आल इंडिया रेडियो पर कोई मोदी के 'मन की बात' सुनने को आतुर हो, ऐसी फोटो तो शायद ही आपने किसी अखबार में देखी हो।
सड़कों पर दौड़ती गाड़ियों में भी आपको एफएम सुनने को मिल जाएगा लेकिन समाज का वो एलीट तबका शायद ही अपने प्रधानमंत्री के 'मन की बात' सुनने के लिए समय निकालने का इच्छुक हो।
ग्रामीणों को नहीं पता किससे करते हैं मोदी 'मन की बात'
प्रधानमंत्री मोदी के मुताबिक 'मन की बात' कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य समाज के उस आखिरी तबके तक अपनी बात पहुंचाने और उसके विचारों को जानने का है जो किसी से अपनी बात नहीं कह पाता और उस तक 'सरकार' की बात नहीं पहुंच पाती।
लेकिन इस कसौटी पर भी मोदी के मन की बात कितनी खरी उतर पाई इसका एक रोचक उदाहरण जानिए। मोदी की दिल्ली से मात्र 50 किलोमीटर दूर यूपी के हापुड़ जिले के एक छोटे से गांव रसूलाबाद नानपुर के ग्राम प्रधान मनोज फौजी इस संबंध में बात करने पर तुरंत कहते हैं कि हां इस बारे में सुना तो है कि मोदी रेडियो पर कोई कार्यक्रम करते हैं, लेकिन क्या है इसका पता नहीं।
जब उनसे पूछा गया कि क्या उनके गांव में कभी मोदी के इस कार्यक्रम को सुना गया है तो भी उनका जवाब निराशाभरा होता है। यूपी के ही सहारनपुर जिले के पहांसू गांव के पूर्व प्रधान राजकुमार इस बात से पूरी तरह अनभिज्ञ हैं कि उनके देश के प्रधानमंत्री रेडियो पर कोई कार्यक्रम भी करते हैं।
जब उन्हें बताया गया कि मोदी ने कुछ दिन पूर्व ही रेडियो पर किसानों की समस्याओं को उठाया था तो उनका जवाब निरुत्तर करने वाला था...''साहब रेडियो पर समस्या पर बात करने से क्या समस्या हल हो जाती है''। यह सवाल हमें फिर एक दूसरे गांव की ओर ले जाता है।
दिल्ली की जड़ में बसे मेरठ का गगसौना गांव अचानक तब सुर्खियों में आया था जब भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने 'चलो गांव की ओर' कार्यक्रम की शुरूआत इस गांव से की। उस समय ग्राम प्रधान पुष्पा के घर भोजन कर राजनाथ सिंह ने किसानों और दलितों के हितों को प्रमुखता से उठाने की बात की थी।
बताते हैं कि पूरे गांव ने वोट भी लोकसभा चुनावों में मोदी को ही दिया, लेकिन जब पुष्पा से पूछा गया कि मोदी के मन की बात कार्यक्रम पर वो क्या सोचती है, तो वो जिज्ञासावश मुंह ताकने लगती हैं। जब उन्हें बताया जाता है कि हर महीने मोदी रेडियो पर लोगों से मन की बात करते हैं तो जवाब फिर वही, ''भैया नहीं पता, हमने तो नहीं सुनी''।
लोगों पर कितना पड़ा 'मन की बात' का असर
आमतौर पर मोदी रेडियो पर अपने कार्यक्रम में आम जनता से जुड़े उन मुद्दों को ही प्रमुखता देते हैं जिन पर अभी तक किसी की निगाह नहीं पड़ी। चाहे वो स्वच्छता अभियान का मुद्दा हो या युवाओं में बढ़ती नशाखोरी की लत का या फिर किसानों की परेशानी हो या फिर छात्र-छात्राओं की समस्याएं।
अपनी हर बात में मोदी किसी एक मुद्दे को उठाकर उस पर विस्तार से बात रखते हैं, इस दौरान वो पूर्व नियोजित कुछ सवालों का जवाब भी देते हैं। आमतौर पर मोदी की इस पहल को इसलिए सराहनीय कहा जा सकता है कि अभी तक किसी प्रधानमंत्री ने इतनी बारीकी से इन छोटे लेकिन जरूरी मुद्दों पर जनता से सीधे जुड़ना जरूरी नहीं समझा था।
मोदी ने यह पहल की ओर इन समस्याओं की ओर सबका ध्यान गया। लेकिन सवाल फिर वही खड़ा हो जाता है कि जिन मुद्दों को मोदी ने अपने हर 'मन की बात' में उठाया क्या उन पर धरातल में कुछ काम हो पाया। भारी प्रचार-प्रसार और जोरशोर से शुरू किया स्वच्छ भारत अभियान शुरूआती उम्मीद जगाने के बाद आगे बढ़ता नहीं दिख रहा है।
युवाओं की नशाखोरी पर मोदी ने बात जरूर की लेकिन यह याद नहीं पड़ता कि सरकारी स्तर पर भी इस पर कोई काम होता दिख रहा है या नहीं। सबसे बड़ा मुद्दा तो किसानों का है, जिनसे मोदी ने रेडियो पर उस समय बात की जब पूरे देश में प्राकृतिक आपदा से हारकर एक-एक कर जिंदगी का साथ छोड़ रहे थे।
मोदी ने बातचीत के दौरान किसानों की हर छोटी बड़ी समस्याओं और जरूरतों पर बात की, उनके हर सुख-दुख में साथ रहने का वादा किया। उन्हें हिम्मत न हारने का हौसला भी दिया, लेकिन क्या किसानों के लिए कुछ बदल पाया। फसल की बर्बादी से टूटा किसान आज भी जिंदगी से हार मान रहा है।
हर बदलते दिन के साथ किसानों की मौत का सिलसिला और बढ़ता जा रहा है। हर साल चौपट होती फसल और साहूकार के कर्ज तले दबे किसान का पेट आश्वासनों और वादों से नहीं भरता।
अपने हर काम की तरह मोदी मन की बात कार्यक्रम से सुर्खियां बटोरने में जरूर सफल रहे। अब तक कुल जमा सात बार उन्होंने जनता से मन की बात की है। जिसे देश की ही नहीं विदेशों की मीडिया ने भी प्रमुखता से जगह दी।
सहज और सीधे जनता से जुड़ने वाली बातों से मोदी का यह कार्यक्रम उस समय सफलता की नई बुलंदियों पर पहुंच गया जब वो दुनिया के सबसे ताकतवर शख्स अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा के साथ एक मंच पर जनता से रूबरू हुए। बीती 27 जनवरी को आयोजित इस कार्यक्रम में मोदी ने अमेरिकी राष्ट्रपति को सीधे-सीधे बराक संबोधित कर अपने देशवासियों के साथ साथ दुनिया को भारत-अमेरिका के बदलते रिश्तों का एहसास कराया।
बराक ओबामा ने भी मोदी की तरह भारतीय जनता से जुड़कर अपने विचारों और अनुभवों को साझा किया। उनकी बातचीत में वही अपनापन झलका जो वो अपनी जनता के साथ रखते हैं। मोदी-ओबामा की इस कैमिस्ट्री को दुनियाभर के मीडिया में सुर्खियां मिली तो अमेरिकी मीडिया ने इसे एक नया अध्याय बताया।
इसके अलावा नेपाल में आए भूकंप के तुरंत बाद मोदी ने रेडियो पर मन की बात के जरिए अपने संदेश में प्राकृतिक आपदा से तड़पते देश को हर संभव मदद का जो आश्वासन दिया उसकी हर किसी ने तारीफ की। मोदी ने रेडियो पर ही नेपाल को छोटा भाई बताते हुए आखिरी व्यक्ति तक मदद पहुंचाने का संकल्प जताया। मोदी की इस अपील का असर भी दिख और पूरा भारत नेपाल की मदद के लिए उठ खड़ा हुआ।