कभी ‘देश की धड़कन’ के रूप में जानी जाने वाली एचएमटी की घड़ियां भले ही देश को समय का बोध कराती हों, पर वक्त की रफ्तार के साथ कदम मिला पाने में रफ्ता-रफ्ता यह पीछे छूट गईं।
1960 के दशक में अपनी स्थापना के बाद करीब तीन दशक तक देश में घड़ियों के बाजार का बेताज बादशाह रही एचएमटी की ‘रियासत’ लुटने की दास्तां भी कमोबेश इतनी ही लंबी है। ‘सोना’ और ‘विजय’ ब्रांड के तहत देश में पहली बार क्वार्ट्ज घड़ियां पेश करने वाली एचएमटी दरअसल क्वार्ट्ज के बाजार में ही पिछड़ने के चलते धीरे-धीरे बाजार से दरकिनार होती चली गई।
कम ही लोग जानते होंगे की भारत में क्वार्ट्ज घड़ियां बनाने के लिए एचएमटी ने जापान की दिग्गज कंपनी सिटीजन के साथ साझेदारी की थी। इसके बावजूद विदेशी घड़ियों की चमक-दमक और नई तकनीकों के आगे वर्षों की साख के बावजूद उसकी चमक फीकी पड़ती गई।
इस असफलता के चलते कंपनी के नीति नियंताओं ने क्वार्ट्ज को छोड़ एक बार फिर से मैकेनिकल घड़ियों पर फोकस करने की रणनीति बनाई।
यह तकरीबन वही वक्त था, जब टाटा समूह की कंपनी टाइटन ने 1987 में अपनी क्वार्ट्ज घड़ियों को बाजार में उतारा और आगे बढ़ती गई। आगे चलकर सस्ती विदेशी घड़ियां बाजार में आने से एचएमटी की स्थिति और डांवाडोल होती गई और आखिरकार वह बंदी के कगार पर पहुंच गई।