लेखकों, कलाकारों, फिल्मकारों और वैज्ञानिकों के बाद अब 50 से अधिक इतिहासकारों ने बृहस्पतिवार को आगे आकर सरकार के विरुद्ध आवाज बुलंद की है।
उनका कहना है कि देश में अत्यधिक बिगड़ते माहौल को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आश्वस्त करने वाला कोई बयान नहीं दिया है। कुल मिलाकर 53 इतिहासकार, जिनमें रोमिला थापर, इरफान हबीब, केएन पणिकर और मृदुला मुखर्जी शामिल हैं, ने संयुक्त बयान जारी कर हालिया घटनाक्रमों पर अपनी गंभीर चिंता जाहिर की है।
दादरी घटना और मुंबई में एक पुस्तक के विमोचन के दौरान सुधींद्र कुलकर्णी पर स्याही फेंके जाने का उल्लेख करते हुए बयान में कहा गया है कि वैचारिक भिन्न्ता को हिंसा के जरिये निपटाने की कोशिश की जा रही है। किसी वाद या तर्क को तर्क के जरिये नहीं बल्कि बुलेट से निपटाने के प्रयास किए जा रहे हैं।
जब एक के बाद एक लेखक सम्मान में दिया गया पुरस्कार वापस कर रहे हों तो ऐसे में विरोध की वजह बनी परिस्थिति पर कोई टिप्पणी नहीं की जाती है। इसके बदले मंत्री इसे कागजी क्रांति का नाम देते हैं और लेखकों को नहीं लिखने की सलाह देते हैं। बयान के अनुसार, यह वैसा ही है कि बुद्धिजीवियों को अगर विरोध करना है तो वे खामोश रहें।