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पेट्रोल के दामों में बढ़ोतरी, किसके नसीब को दोष दें?

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अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में वृद्घि के बाद देश में पेट्रोल और डीजल के दाम बढ़ गए। गुरुवार आधी रात से पेट्रोल 3.96 रुपए और डीजल 2.37 रुपए प्रति लीटर महंगा हो गया।
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पेट्रोल और डीजल के दामों में बढ़ोतरी या गिरावट का किसी भी देश के प्रधानमंत्री के नसीब से कतई संबंध नहीं होता। कम से कम अर्थशास्त्री ऐसा दावा तो करते ही हैं। हालांकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले वर्ष पेट्रोल और डीजल के दामों में लगातार हुई कमी को अपने नसीब से जोड़ दिया था।

दिल्ली विधानसभा चुनावों में एक रैली में उन्होंने कहा था कि अगर पेट्रोल और डीजल के दाम उनके नसीब से गिरे हैं तो फिर जनता को बदनसीब क्यों चाहिए?

नरेंद्र मोदी ने पिछले वर्ष 26 मई को कमान संभाली थी। एक वेबसाइट के मुताबिक, उसके बाद से पेट्रोल के दामों में तकरीबन 13 बार गिरावट हुई और 6 बार बढ़ोतरी। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में उथपुथल के कारण ये तब्दीली होती रही।
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चुनावों में फायदा लेने से भी नहीं चूके थे प्रधानमंत्री

हाल‌ांकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पेट्रोलियम पदार्थों के दामों में गिरावट का श्रेय लेने से नहीं चूके। दिल्ली विधानसभा चुनावों में द्वारका में हुई एक रैली में उन्होंने भीड़ से पूछा, 'डीजल और पेट्रोल के दाम कम हुए हैं या नहीं? आपकी जेब में पैसा बचने लगा की नहीं?' 

भीड़ ने जब उन्हें हां जवाब में दिया तो वे बोले, 'अब हमारे विरोधी लोग कहते हैं कि क्योंकि मोदी नसीब वाला है, इसलिए ऐसा हो रहा है तो भाई अगर मोदी का नसीब देश की जनता के काम आता है तो इससे बढ़िया नसीब की बात क्या हो सकती है? आपको नसीब वाला चाहिए या बदनसीब?'

गुरुवार को पेट्रोल में दामों में 3.96 रुपए की बढ़ोतरी हुई। केंद्र में मोदी सरकार आने के बाद से ये सबसे बड़ी बढ़ोतरी है, जबकि सबसे बड़ी गिरावट 2.42 पैसे की थी।

सवाल उठना लाजिमी है कि पेट्रोल या डीजल के दामों में गिरावट प्रधानमंत्री नरेंद्र मोद के नसीब से हुई तो बढ़ोतरी का ठीकरा किसकी बदनसीबी पर फोड़ा जाए?
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पहले दिल्ली ने बनाया 'बदनसीब' और अब बंगाल ने

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नसीब का सूर्य पेट्रोल और डीजल की कीमतों के कारण ही नहीं डूबा है। लोकसभा चुनावों के बाद विधानसभा दर विधानसभा चुनाव जीतने के बाद उन्होंने जो अश्वमेध का घोड़ा छोड़ा था, उसे दिल्ली में रोक लिया गया।

पिछले सप्ताह बंगाल में आए निकाय चुनावों के नतीजों में भी बीजेपी धराशायी हो गई।

बंगाल समेत पूर्वोत्तर में अपना जनाधार मजबूत करने को दावा कर रही भाजपा पार्टी निकाय चुनाव में सत्तारूढ़ टीएमसी को कड़ी टक्कर देना तो दूर वाम दलों और कांग्रेस से भी बहुत पीछे छूट गई।

91 नगर निगमों में से भाजपा एक पर जीत दर्ज नहीं कर पाई। लोकसभा चुनावों में शानदार प्रदर्शन करने के बाद भाजपा जैसी तैयारियां कर रही थी, उससे माना जा रहा था कि आगामी विधानसभा चुनावों में बंगाल के सियासी समीकरण बदल सकते हैं। हालांकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का नसीब वहां भी अपना असर नहीं दिखा पाया।
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