निठारी कांड में फांसी की सजा पाए सुरेंद्र कोली की सजा पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अगले आदेश तक के लिए रोक लगा दी है। कोली को फांसी देने में हुए विलंब के आधार पर सजा माफ करने के लिए दाखिल जनहित याचिका पर सुनवाई कर रही मुख्य न्यायाधीश डा. डीवाई चंद्रचूड और न्यायमूर्ति पीकेएस बघेल की खंडपीठ ने केंद्र और राज्य सरकार से कोली की दया याचिका खारिज करने संबंधी सभी कागजात 21 नवंबर तक तलब कर लिए हैं। मामले की सुनवाई 25 नवंबर को होगी।
पीपुल्स यूनियन फॉर डेमोक्रेटिक राइट(पीडीयूआर) ने जनहित याचिका दाखिल कर कोली की फांसी माफ करने की मांग की है। पीडीयूआर ने सजा के क्रियान्वयन में हुए विलंब को मुख्य आधार बनाया है।
कहा गया कि फांसी का आदेश दिए जाने के बाद राज्यपाल और फिर राष्ट्रपति ने दया याचिकाओं के निस्तारण में तीन वर्ष तीन माह का असाधारण विलंब किया है। इतना ही नहीं राज्यपाल द्वारा दया याचिका खारिज होने के बाद राष्ट्रपति के पास इसे भेजने में तीन माह का विलंब किया। पीडीयूआर ने दया याचिकाओं के निस्तारण की प्रक्रिया को भी दोषपूर्ण बताया है।
सुप्रीमकोर्ट द्वारा पूर्व में अत्यधिक विलंब के आधार पर फांसी की सजाएं माफ किए जाने का भी उदाहरण दिया गया। केंद्र सरकार की ओर से एडिशनल सॉलीसिटर जनरल अशोक मेहता ने याचिका की पोषणीयता पर सवाल उठाया।
उन्होंने कहा कि इस मामले में जनहित याचिका पोषणीय नहीं है। कोली की दया याचिका 28 जुलाई 2014 को राष्ट्रपति द्वारा खारिज कर दी गई थी। इसके बाद कोली ने चार पेज का पत्र सुप्रीमकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को लिखा जिसे पुनरीक्षण याचिका के तौर पर स्वीकार करते हुए सुप्रीमकोर्ट ने 28 अक्तूबर तक फांसी पर रोक लगा दी थी। 28 अक्तूबर को पुनरीक्षण अर्जी पर खुली अदालत में सुनवाई के बाद इसे खारिज कर दिया।
इसके बाद कोली को फांसी दिए जाने का रास्ता साफ हो गया था। अब पीडीयूआर ने सजा देने में विलंब को आधार बनाते हुए पीआईएल दाखिल कर कहा है राष्ट्रपति के आदेश का न्यायिक पुनरीक्षण हो सकता है।