उत्तर प्रदेश सरकार को तगड़ा झटका देते हुए हाईकोर्ट ने प्राथमिक विद्यालयों में सहायक अध्यापक बनाए गए 1.70 लाख शिक्षामित्रों का समायोजन असंवैधानिक करार देते हुए रद्द कर दिया है।
कोर्ट ने इससे संबंधित सरकार के सभी प्रशासनिक आदेशों सहित शिक्षामित्रों को सहायक अध्यापक बनाने के लिए बेसिक शिक्षा सेवा नियमावली में किए गए संशोधन और उन्हें दिए गए दो वर्षीय दूरस्थ शिक्षा प्रशिक्षण को भी असंवैधानिक और मनमाना बताते हुए अवैध करार दिया है।
शिक्षामित्रों के समायोजन को चुनौती देने वाली दर्जनों याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए मुख्य न्यायमूर्ति डा.डीवाई चंद्रचूड, न्यायमूर्ति दिलीप गुप्ता और न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा की पूर्णपीठ ने कहा कि न्यूनतम अर्हता में छूट देने का अधिकार सिर्फ केंद्र सरकार को है, राज्य सरकार को नहीं है।
शिक्षामित्रों का समायोजन बिना स्वीकृत पद तथा नियमानुसार चयन प्रक्रिया और आरक्षण नियमों का पालन किए ही कर दिया गया। ऐसे में सरकार का यह कदम असंवैधानिक, मनमाना और अवैध है।
न्यूनतम अहर्ता भी नहीं रखते
पूर्वपीठ ने कहा नि:शुल्क और अनिवार्य शिक्षा अधिनियम प्रावधानों के अनुसार शिक्षामित्र, एनसीटीई की ओर से तय की गई न्यूनतम अर्हता भी नहीं रखते हैं।
प्रदेश सरकार को बेसिक शिक्षा सेवा नियमावली में संशोधन कर न्यूनतम योग्यता तथा अध्यापक की परिभाषा बदलने और केंद्र सरकार तथा एनसीटीई की ओर से तय मानक से इतर जाकर नियुक्ति के नए मानक बनाने का अधिकार नहीं है।
प्रदेश सरकार ने शिक्षामित्रों को सहायक अध्यापक के पद पर समायोजित करने के लिए बेसिक शिक्षक सेवा नियमावली 1981 में संशोधन करके शिक्षामित्रों को न सिर्फ टीईटी की अनिवार्यता से छूट दे दी बल्कि एनसीटीई से दो वर्षीय दूरस्थ प्रशिक्षण दिलाने का अनुमोदन भी प्राप्त कर लिया।
एनसीटीई के वकील रिजवान अहमद ने कोर्ट को बताया कि प्रदेश सरकार को स्नातक शिक्षामित्रों को प्रशिक्षण देने की अनुमति दी गई थी। बाद में उसने स्वयं शासनादेश जारी कर इंटर पास वालों को प्रशिक्षण दिलाकर सहायक अध्यापक बना दिया।
मानदेय पर रखे गए थे शिक्षामित्र
प्राथमिक विद्यालयों में शिक्षामित्रों को रखने की प्रक्रिया 1999 में प्रारंभ की गई। बेरोजगार युवकों को स्थानीय स्तर पर रोजगार दिलाने और स्कूलों में प्रशिक्षित अध्यापकों की कमी को देखते हुए सरकार ने गुजरात मॉडल पर यह व्यवस्था लागू की।
शिक्षामित्रों को एक निश्चित मानदेय पर मात्र 11 माह के लिए संविदा पर नियुक्ति दी गई। ग्राम समितियों और जिला समिति की ओर से स्थानीय स्तर पर किए गए चयन में आरक्षण नियमों का पालन भी नहीं हुआ।
जिस ग्रामसभा में जिस जाति के प्रधान थे उसी जाति कि शिक्षामित्रों को रख लिया गया। कोर्ट ने कहा कि यह बात स्पष्ट रूप से शिक्ष मित्रों को भी पता है कि उनकी नियुक्ति अस्थायी और संविदा आधारित है लिहाजा नियमितीकरण या समायोजन संभव नहीं है।
टीईटी मोर्चा ने जताई फैसले पर खुशी
शिक्षामित्रों का समायोजन रद्द किए जाने के हाईकोर्ट के फैसले पर टीईटी मोर्चा के अभ्यर्थियों ने खुशी जताई है। मोर्चा के प्रदेश अध्यक्ष शिव कुमार पाठक ने फैसले को मील का पत्थर बताया। इससे टीईटी पास अभ्यर्थियों को काफी राहत मिली है।
मोर्चा के संयोजक संजीव मिश्रा का कहना है कि उच्च न्यायालय ने सरकार द्वारा अपनाई गई असंवैधानिक प्रक्रिया को नकार कर एक सही और दूरगामी निर्णय दिया है।
इससे योग्य अभ्यर्थियों को शिक्षक बनने का मौका मिल सकेगा। मोर्चा के सचिव शैलेश उपाध्याय का कहना है कि सरकार को शिक्षा जैसे आधार भूत मुद्दे पर राजनीति से प्रेरित निर्णय लेने के बजाए व्यापक जनहित में निर्णय लेना चाहिए।
अखिलेश पांडेय ने फैसले का स्वागत करते हुए कहा कि कोर्ट का यह फैसला संकीर्णता विहीन समाज के विकास में दूरगामी साबित होगा।