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लिव इन संबंधों पर कोर्ट ने दिया अहम फैसला

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दिल्ली हाईकोर्ट ने लिव-इन संबंधों को भारतीय दंड संहिता के तहत बलात्कार की श्रेणी से बाहर रखने संबंधी याचिका खारिज कर दी है। अदालत ने कहा कि विवाह के बंधन का दर्जा किसे दिया जाए, किसे नहीं, यह मामला विधायिका का है अदालत का नहीं।
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मुख्य न्यायाधीश जी. रोहिणी व न्यायमूर्ति आरएस एंडलॉ की खंडपीठ ने कहा कि वे इस तथ्य पर फैसला नहीं दे सकते कि लिव-इन संबंधों के दौरान बने शारीरिक संबंधों को रेप न माना जाए, बल्कि इसे धोखाधड़ी का अपराध माना जाए।

अदालत ने कहा कि कानून बनाना अदालत का काम नहीं है, बल्कि अदालत का काम कानून का पालन करवाना है। पीठ ने कहा कि लिव-इन संबधों को रेप की श्रेणी में रखा जाए या अन्य अपराध की श्रेणी में, यह तय करना विधायिका का काम है।
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मामलों को धोखाधड़ी में रखने की थी मांग

अदालत ने कहा कि हम महसूस करते हैं कि याचिका का कोई ठोस आधार नहीं है, अत: इसे खारिज किया जाता है। इस मुद्दे को लेकर दायर जनहित याचिका में आग्रह किया गया था कि लिव इन संबधों में यदि विवाह नहीं हो पाता तो वह मामला धोखाधड़ी का है न कि रेप का।

ऐसे में रेप की अपेक्षा मामला धोखाधड़ी में दर्ज करने का निर्देश दिया जाए। याची ने तर्क रखा कि एक रिकॉर्ड के अनुसार ऐसे अधिकांश मामलों में कोर्ट आरोपी को बरी कर रहे हैं, क्योंकि फर्जी मामले दर्ज किए जाते हैं।

याची ने कहा कि 70 प्रतिशत मामलों में आरोपी दोषी नहीं पाया जाता, लेकिन झूठे मामलों के कारण आरोपी ही नहीं बल्कि उसका पूरा परिवार यातना झेलता है। याची ने यह भी आग्रह किया था कि फंसाए गए व्यक्ति को मुआवजा देने के अलावा उस महिला के खिलाफ कार्रवाई भी की जाए।
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