दिल्ली हाईकोर्ट ने लिव-इन संबंधों को भारतीय दंड संहिता के तहत बलात्कार की श्रेणी से बाहर रखने संबंधी याचिका खारिज कर दी है। अदालत ने कहा कि विवाह के बंधन का दर्जा किसे दिया जाए, किसे नहीं, यह मामला विधायिका का है अदालत का नहीं।
मुख्य न्यायाधीश जी. रोहिणी व न्यायमूर्ति आरएस एंडलॉ की खंडपीठ ने कहा कि वे इस तथ्य पर फैसला नहीं दे सकते कि लिव-इन संबंधों के दौरान बने शारीरिक संबंधों को रेप न माना जाए, बल्कि इसे धोखाधड़ी का अपराध माना जाए।
अदालत ने कहा कि कानून बनाना अदालत का काम नहीं है, बल्कि अदालत का काम कानून का पालन करवाना है। पीठ ने कहा कि लिव-इन संबधों को रेप की श्रेणी में रखा जाए या अन्य अपराध की श्रेणी में, यह तय करना विधायिका का काम है।