अरब सागर से लगे गुजरात के क्रीकों यानि संकड़ी खाड़ियों के 4050 वर्ग किलोमीटर के मकड़जाल की चौकसी कर रही सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) के लिए छोटे से हरामी नाले को काबू करना सबसे चुनौतीपूर्ण काम है।
हरामी नाला दरअसल भारत-पाक सीमा के वर्टिगल लाईन से पाकिस्तान की तरफ से निकलता है। भारत की जमीन पर करीब 21 किमी चलने के बाद फिर पाक में घुस जाती है।
बीएसएफ के लिए मुसीबत यह है कि यह नाला भारत के सामरिक लिहाज से सबसे अहम 1175 पोस्टों से सिर्फ पांच किमी की दूरी पर है।
यहां भौगोलिक हालात पाक के पक्ष में है, क्योंकि सीमा के उस पार पाकिस्तान के सिंध इलाके में क्रीकों और दलदली जमीन की वह समस्या नहीं, जो भारत की तरफ है।
सीमा के उस पार करीब दस किमी पर ही पाकिस्तान के गांवों की घनी आबादी है। इस हालात में सबसे बड़ा खतरा है कि पाकिस्तानी फौज मछुआरों के भेष में आकर भारतीय जमीन पर कब्जा जमा लें तो बीएसएफ अपने लड़ाकू नावों से यहां सीधे नहीं पहुंच सकती।
यही वजह है कि बीएसएफ को इन क्रीकों के बीच अति विकट परिस्थितियों के बावजूद एक बार्डर आउट पोस्ट (बीओपी) कायम करनी पड़ी, जहां 16 से 20 जवानों की टुकड़ी हमेशा मौजूद रहती है।
इसकी वजह है कि हरामी नाला इस इलाके में मौजूद सबसे बड़े सर क्रीक और अन्य चार क्रीकों से कहीं भी नहीं जुड़ती।
ऐसे में क्रीकों के लिए तैयार की गई बीएसएफ की जल टुकड़ी और क्रोकोडाइल कमांडो हरामी नाले तक सीधे नहीं पहुंच सकते। इस विकट भौगोलिक परिस्थिति में नाले के लिए अलग से बड़े इंतजाम करना भारत की मजबूरी है।
इसके लिए 2010 में भारत ने इटली से चार ऑल टरेन व्हीकल (एटीवी) खरीदी है। हरामी नाले की सुरक्षा व्यवस्था की लाइफ लाईन यह एटीवी रोज अति दलदली जमीन पर नजदीकी पक्के 1175 पोस्ट से आठ किमी चल कर नाले की ट्राई जंक्शन आउट पोस्ट पर जवानों को खाना-पानी और असलहे पहुंचाती है।
यहां के भौगोलिक हालात ऐसे दुर्गम हैं कि जवानों की एक टुकड़ी को चौबीस घंटे से ज्यादा नहीं रखा जा सकता।
26/11 के आतंकी हमले के बाद इस इलाके में पाकिस्तानी हरकतों के मद्देनजर बीएसएफ ने हरामी नाले पर 2009 में अपना कब्जा कायम किया था।
इसके बाद से एटीवी आने तक इस दुर्गम दलदली आठ किमी. का सफर पैदल ही तय करते थे। इस इलाके में गए बिना कतई अंदाजा नहीं लगाया जा सकता कि बीएसएफ किन विकट हालात में इस छोटे से नाले की सुरक्षा कर रही है।