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'मुसलमानों को गुजरात के बाहर ही सांस आती है'

Tue, 29 Apr 2014 04:32 PM IST
दिव्या आर्य/बीबीसी संवाददाता, गुजरात
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हुमा निज़ामी और नियाज़ बीबी का जीवन बहुत अलग है। हुमा कॉलेज में एसोसिएट प्रोफ़ेसर हैं, अपना मकान है, गाड़ी है और बच्चे बड़े प्राइवेट स्कूल में पढ़ रहे हैं। नियाज़ बीबी अनपढ़ हैं, चॉलनुमा इमारत के एक कमरे में रहती हैं और उनके नाती मोहल्ले के एक छोटे से स्कूल में पढ़ते हैं।
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जो उन्हें जोड़ता है वह है 'हिंसा का डर', जिसकी वजह से दोनों अहमदाबाद के जुहापुरा इलाक़े में रहने लगीं।

एक का घर जलाया गया 1990 में, राम जन्मभूमि के आंदोलन के दौर में। और एक का 2002 के दंगों के दौरान। दोनों जुहापुरा आए 'अपने लोगों' के बीच सुरक्षा ढूंढने। और यहीं रह गए।

सालों बाद भी इतना डर क्यों?

हुमा कहती हैं इसलिए नहीं कि रहना चाहते हैं, बल्कि इसलिए की शहर के किसी हिन्दू बहुल इलाक़े में रहने का मन नहीं करता, हिम्मत नहीं होती।

जुहापुरा अब अहमदाबाद में मुसलमानों का सबसे बड़ा बसेरा हो गया है। दंगों के इस दौर से पहले जुहापुरा की आबादी क़रीब 85,000 हुआ करती थी, जो अब बढ़कर क़रीब चार लाख हो गई है।

इतने सालों बाद भी इतना डर क्यों? क्या कुछ नहीं बदला है?

जिंदगी के लिए संघर्ष

ऐसा नहीं कि हर व़क्त हमले का डर रहता है। पर रोज़ाना बढ़ती मानसिक हिंसा का सामना करना पड़ता है।

हुमा की बेटी के ज़्यादातर हिन्दू दोस्त उसके घर आने से मना कर देते हैं। ऑटो वाले इलाक़े में आने से मना कर देते हैं। और सरकार ने तो मानो अपना रास्ता बदल लिया है।

स्टेट ट्रान्सपोर्ट की बस अब जुहापुरा नहीं आती, बाहर से ही घूम जाती है। पीने का पानी सप्लाई नहीं होता, उसके लिए अपने ख़र्च पर बोरिंग करवानी पड़ती है। जगह-जगह नाली का पानी सड़क पर बिखरा रहता है जो कई जगह से टूटी हुई है।

मुसलमान होने का अहसास रोज़

न यह रहने की सबसे अच्छी जगह है और न ही यहां अलग-अलग लोग, बोलचाल या संस्कृति का रस मिलता है। बल्कि जुहापुरा, रोज़ हुमा को मुसलमान होने का अहसास दिलाता है। याद दिलाता है कि वह वहां इसलिए हैं क्योंकि शादी के व़क्त ये उनके ख़ौफ़ज़दा पिता की शर्त थी कि वह अपनी सुरक्षा के लिए मुस्लिम बहुल इलाक़े में रहें।

यह उन्हें याद दिलाता है कि एक प्राइवेट बैंक ने उन्हें होम लोन देने से मना कर दिया था क्योंकि उसका मानना था कि जुहापुरा में रहने वाले कर्ज़ का भुगतान करने में चूक जाते हैं।

और याद दिलाता है कि जुहापुरा के ठीक बाहर बनी वे तमाम सोसायटीज़ जहां हिन्दू रहते हैं, वहां पानी उपलब्ध है, परिवहन की सुविधा है, सड़कें हैं और नालियां बनी हैं और वहां किसी ऑटो वाले को जाने में कोई परहेज़ नहीं।

दंगों के बाद बचपन

जो बुनियादी सुविधाएं नदारद हैं, जिन्हें हुमा ख़रीद सकती हैं, नियाज़ बीबी ने उनके बिना रहने की आदत डाल ली है।

दो माले के घर में रहने की आदी नियाज़ बीबी का छह लोगों का परिवार अब एक कमरे में रहता है। अपने खेत पर काम करने वाले उनके पति अब बेरोज़गार हैं। एक बेटा मैकेनिक और एक सेल्समैन है।

गांव के खुले मैदान की जगह, उनके नातियों का बचपन शहरी चॉल के गलियारों में कट रहा है। वो मुसलमानों के बीच ही पढ़ते हैं, उन्हीं के बीच खेलते हैं।

धर्म इंसानों को बांटता नहीं है

दंगों और उससे जुड़े विस्थापन के बाद जुहापुरा में पैदा हुए इन बच्चों के लिए हिन्दू बच्चे एक पहेली हैं। जिसका जवाब वे जब कभी अपने परिवार में होती पुरानी बातों में ढूंढते हैं तो उन्हें समझाया जाता है कि वे भी सच नहीं हैं।

कि सच्चाई दरअसल अच्छे प्यार भरे रिश्ते हैं, कि धर्म इंसानों को बांटता नहीं है, कि जिस हिंसा की बात उनके कानों ने सुनी है, वह मानो हुई ही नहीं थी।

नौ-दस साल के इन लड़कों से जब मैं पूछती हूं कि उनके हिन्दू दोस्त हैं क्या? तो वह बोल पड़ते हैं, "नहीं, हिन्दू तो बुरे होते हैं"। और जब मैं कहती हूं कि मैं भी हिन्दू हूं तो वो सर हिलाकर मानने से इनकार कर देते हैं।

यह खाई बहुत गहरी है

साल 2003 में निर्देशक राकेश शर्मा ने गुजरात में हुए दंगों और उसके बाद के चुनाव प्रचार पर एक डॉक्यूमेन्ट्री फ़िल्म बनाई थी- 'फ़ाइनल सोल्यूशन'।

उस फ़िल्म के आख़िरी दृश्य में कुछ इन्हीं लड़कों की उम्र के एक मुसलमान लड़के ने राकेश शर्मा को कुछ यही कहा था।

वह बच्चा भी हिन्दुओं से नाराज़ था, पर राकेश शर्मा को अच्छा इंसान समझता था, इसलिए जब उन्होंने बताया कि वह हिन्दू हैं तो उसने भी मानने से इनकार कर दिया। (दीवार की बाईं ओर हिंदू आबादी और दाईं ओर मुस्लिम आबादी रहती है। दोनों इलाक़ों में फ़र्क आसानी से देखा जा सकता है।)
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यह खाई पाटी जानी चाहिए

उस बच्चे ने दंगों की हिंसा देखी थी और इन बच्चों ने सीमाओं से हुआ विभाजन जिया है। समय मानो रुक गया हो। जैसे 12 साल बाद भी, नई पीढ़ी को वापस वहीं लाकर खड़ा कर दिया गया हो।

हालात में बदलाव की यही नाउम्मीदी हुमा और नियाज़ बीबी को जुहापुरा के चार लाख मुसलमानों के साथ जोड़ती है। हालांकि नियाज़ बीबी चाहती हैं कि यह खाई पट जाए लेकिन वह जानती हैं कि अब इसे पाटा नहीं जा सकता।

हुमा के मुताबिक़ उन्हें सांस तब आती है जब वो गुजरात से बाहर, भारत से बाहर होती हैं, जब उन्हें मुसलमान नहीं, बल्कि एक भारतीय नागरिक समझा जाता है।
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