कारोबार के सिलसिले में अब तक सूरत के हीरा व्यापारियों के प्रतिनिधि ही काशी आते रहे, लेकिन इधर कुछ हीरा व्यापारी खुद आ पहुंचे हैं अपने ‘नायाब हीरे’ की कीमत बताने।
इन व्यापारियों ने किसी सितारा होटल की बजाय किराए के फ्लैट में या स्थानीय दोस्त व्यवसायी के घर ठहरने को तवज्जो दी है।
वजह, उन्हें लोगों के बीच रहकर अपने हीरे यानि नरेंद्र मोदी के पक्ष में माहौल जो बनाना है। फिलहाल वे यहां के कारोबारियों से मिल रहे हैं और धंधे के बारे में बात कर रहे हैं, लेकिन बीच-बीच में चुनावी पारे का हाल भी पूछ ले रहे हैं।
मुस्लिम बस्तियों में हो रहा प्रचार
शहर के एक बड़े उद्यमी घराने के मुखिया ने अपने यहां ठहरे गुजराती व्यापारी के हवाले से बताया कि आगे और भी जमातों के लोग ग्रुप में बनारस आएंगे। बुनकरों का एक दल तो दोस्त व्यापारी के साथ ही चला था।
गुजराती बुनकर यहां की मुस्लिम बस्तियों में अपनी तरक्की की तस्वीर और इसमें मोदी के योगदान की चर्चा कर लोगों को समझाएंगे कि उनकी जो छवि पेश कर डराया जाता रहा है, हकीकत उससे एकदम अलग है।
इसी तरह पिछड़े वर्ग के मतदाताओं के बीच प्रचार के लिए कामगारों के दस्ते ही नहीं, बल्कि प्रोफेशनल्स की टीमें भी आएंगी और मतदान तक रहेंगी। इसमें तो भारी खर्च आएगा?
चाय की दुकान पर प्रचार
इस सवाल गुजराती व्यापारी का कहना था, परवाह नहीं, 1977 के बाद अब मौका आया है अपने भाई के प्रधान मंत्री बनने का।
वाराणसी संसदीय सीट से भाजपा के पीएम कैंडिडेट नरेंद्र मोदी के चुनाव लड़ने की घोषणा और उनसे मुकाबले के लिए आम आदमी पार्टी के अरविंद केजरीवाल के ताल ठोकने से समूचे शहर में राजनीतिक चर्चाओं का बाजार गरम है।
होली बीती पर बुढ़वा मंगल तो बाकी है, सो गलियों में फाग जारी है, ‘आय गयल दिन अब हमार, बोलो सररर...।’ (अब जनता के दिन आ गए)।
चाय-पान की दुकानों से लेकर प्रमुख दलों के कार्यालयों तक में आगे क्या होगा? इसी की चर्चा है। वहीं, आजमगढ़ सीट से सपा सुप्रीमो मुलायम के चुनाव लड़ने के ऐलान के बाद पूर्वांचल में राजनीतिक लड़ाई और रोचक होती नजर आ रही है।
बदल रहा है मुस्लिमों का मिजाज
मुसलमान लोग पहले आंख मूंदकर सपा का समर्थन करते थे, लेकिन अब स्थिति बदल गई है। बुनकर बहुल लल्लापुरा इलाके में रोजमर्रा के काम से छूटने के बाद रोज की तरह गुरुवार की दोपहर चाय-पान की दुकानों पर चुनाव की चर्चा में मशगूल थे।
एक अड़ी पर चर्चा थी मोख्तार भाई का अभी तक संदेश नहीं आया। वहीं कुछ लोग केजरीवाल के हिमायती दिखे।
एक कंपनी के असिस्टेंट मैनेजर अरशद आलम ने बताया कि मुजफ्फनगर दंगे के चलते काफी लोग मुलायम से नाखुश हैं। पढ़ा-लिखा तबका नरेंद्र मोदी का भी समर्थन कर रहा है।
मीडिया का फोकस बनारस पर
चुनावी समर में दिग्गजों के ताल ठोंकने से काशी सुर्खियों में आ गई है। नरेंद्र मोदी के मुकाबले अरविंद केजरीवाल का नाम आने के बाद राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय मीडिया का यहां डेरा पड़ने लगा है।
अस्सी घाट पर जहां हर चैनल के ओवी वैन लग गए हैं। चैनलों की ओर से रायशुमारी की जा रही है कि कौन किसे पसंद करेगा।
एक चैनल की महिला रिपोर्टर रात अस्सी घाट पर भीड़ के बीच मोदी के विरोध में टिप्पणी देने वाले की तलाश करती रहीं, पर बार-बार आग्रह के बाद भी कोई सामने नहीं आया।