आतंकवाद के कथित तौर पर झूठे मामलों में फंसे मुस्लिम लड़कों की पहचान करने और उन्हें केस से बाहर निकालने की केंद्र सरकार की योजना चार कदम का फासला भी नहीं तय कर पाई।
यूपीए सरकार के कार्यकाल के अंतिम दौर में अति गोपनीय तरीके से शुरू की गई यह कोशिश केंद्र और राज्य के संबंधों की तकनीकी व कानूनी जटिलता में फंस कर रह गई। इसके अलावा उत्तर प्रदेश पुलिस की एसटीएफ, मुंबई की एटीएस, गुजरात पुलिस और दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल जैसे राज्यों के विशेष पुलिस दस्ते ने इस योजना पर सहयोग नहीं करने का संकेत शुरू में ही दे दिया था।
इस काम की जिम्मेदारी निभा रहे खुफिया विभाग आईबी के शीर्षस्थ अधिकारी ने अमर उजाला को बताया कि आतंकी घटना के केस निपटाने के दबाव में कई राज्यों की पुलिस ने उन लड़कों को आरोपी बनाकर गिरफ्तार कर रखा है, जिनका वारदात से कोई लेना-देना नहीं है।
केंद्र के अल्पसंख्यक मंत्रालय को देश के कई हिस्सों से इसकी शिकायत लंबे समय से मिल रही थी। इस समुदाय में उभर रहे असंतोष के मद्देनजर यूपीए सरकार में अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री रहमान खान ने तत्कालीन गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे से इस दिशा में गंभीर कदम उठाने की सिफारिश की थी।
सूत्रों के मुताबिक इस बातचीत में गुजरात के अक्षरधाम मंदिर, मुंबई के सीरियल ट्रेन धमाके, मालेगांव, अजमेर शरीफ धमाका और मुंबई तथा दिल्ली में हुए कई धमाकों की पुलिस जांच को उदाहरण के तौर पर उठाया गया।