फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टिच्यूट ऑफ इंडिया (एफटीआईआई) में चल रहे गतिरोध को खत्म करने के लिए केंद्र सरकार शायद इस हफ्ते बिना किसी शर्त हडताली छात्रों से बातचीत शुरू करे। एफटीआईआई के अध्यक्ष पद पर गजेंद्र चौहान की नियुक्ति के खिलाफ वहां छात्रों का आंदोलन शुरू हुए सौ दिन से ज्यादा हो चुके हैं।
आंदोलन कर रहे छात्रों के खिलाफ बडा प्रचार अभियान भी चलाया जा रहा है। इस आंदोलन की वजह से सरकार की किरकिरी हो रही है। सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी के कुछ लोगों का यह भी मानना है कि एफटीआईआई वामपंथी छात्रों का गढ है, लिहाजा, वहां किसी की नियुक्ति होती, छात्र विरोध ही करते। पर यह तथ्य से परे है।
इसके पहले की भाजपा सरकार ने अभिनेता विनोद खन्ना को इंस्टिच्यूट का अध्यक्ष बनाया था। खन्ना भाजपा के सांसद थे। उनकी नियुक्ति पर किसी ने अंगुली नहीं उठाई थी। सिनेमा जगत में उनकी ख्याति और प्रभाव की वजह से सभी ने उन्हें स्वीकार कर लिया। मजे की बात तो यह है कि संस्थान के खिलाफ ही प्रचार चलाया जा रहा है।
पर यह है सच
यह कहा जा रहा है कि बीते कई दशकों से एफटीआईआई से कोई बडा कलाकार नहीं
निकला है। स्वयं चौहान ने कहा, "राजकुमार हीरानी को छोड कर इस संस्थान ने
कोई महत्वपूर्ण कलाकार नहीं दिया है। "पर सच तो यह है कि एफटीआईआई से कई
बडे कलाकार निकले हैं।
हीरानी के बैच के ही श्रीराम राघवन ने इसी साल
रिलीज हुई हिट हिंदी फिल्म 'बदलापुर' का निर्देशन किया था। वे 1987 में
एफटीआईआई से पास हुए थे। इस फिल्म में वरुण धवन और नवाजुद्दीन सिद्दीकी ने
अभिनय किया है। मलयालम फिल्म 'प्रेमम' अभी सिनेमाघरों में चल ही रही है।
इसमें विनय फोर्ट ने अभिनय किया है, जो 2009 में संस्थान से पास हुए। इसी
तरह साल 2011 में संस्थान से पास हुए अविनाश अरुण मराठी फिल्म 'किल्ला' के
निर्देशक हैं। इस फिल्म को 2014 में राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार
मिले। इस फिल्म की कहानी लिखने वाले तुषार परांजपे भी इसी संस्थान के हैं।
सरकार का दावा गलत
यह सूची लंबी है। छात्र लंबे समय से संस्थान की कई समस्याओं की ओर लोगों का ध्यान खींचते रहे हैं। अब सरकार भी यही कह रही है। पर इसके साथ-साथ सरकार संस्थान से पास हुए छात्रों के बारे में गलत जानकारियां भी फैला रही है। मुख्य धारा की मीडिया और सोशल मीडिया पर भाजपा समर्थकों के चलाए जा रहे प्रचार अभियान का संभावित मकसद भी उभर कर सामने आ रहा है।
एक स्तंभकार ने लिखा, "एफटीआईआई को केंद्र से पैसा देना बंद कर दिया जाना चाहिए। एक दूसरी संस्था बनाई जाए, जिसे सही सोच वाले अकादमिक लोग और बुद्धिजीवी चलाएं। ये वे लोग हों, जिनकी सोच हमसे मिलती जुलती हो। "ऐसे ही एक दूसरे स्तंभकार का कहना है कि सरकार एफटीआईआई के हर छात्र पर सालाना 13 लाख रुपए खर्च करती है।
यह इंडियन इंस्टिच्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी के छात्रों पर होने वाले खर्च का चार गुना है। संस्थान के एक छात्र ने आरटीआई अर्जी दी तो मिली जानकारी से सरकार का यह दावा गलत निकला। सरकार छात्रों के अलावा और जो खर्च करती हैं, वे सब इस मद में दिखाए गए। मसलन, प्रधानमंत्री राहत कोष में दिया गया पैसा, बाहरी लोगों के लिए फिल्म एप्रीसिएशन कोर्स पर हुआ खर्च और देश भर के फिल्म स्कूलों में हुई प्रतियोगिता पर हुआ खर्च भी इसमें ही दिखाया गया।
मंत्रालय ने किया इंकार
एफटीआईआई छात्र संघ ने एक प्रेस बयान में यह आरोप लगाया है कि 3 जुलाई की बातचीत में सूचना और प्रसारण मंत्री अरुण जेटली ने उन्हें संस्था बंद करने की धमकी दी थी। बयान के मुताबिक, जेटली ने कहा कि यदि छात्रों ने जल्द ही हडताल खत्म नहीं की तो "संस्थान को बंद किया जा सकता है और इसका निजीकरण" किया जा सकता है।
मंत्रालय ने इससे इंकार किया है। पर उस बैठक में मौजूद फिल्मी हस्तियों ने छात्रों के कहे की तसदीक की है। क्या निजीकरण को ध्यान में रख कर ही जून में गजेंद्र चौहान की नियुक्ति की गई थी?एक सम्मानजनक कलाकार सरकार के दबाव में उस तरह नहीं आएगा जैसा एक नामालूम सा आदमी उसकी बातों को मानेगा।
इसके अलावा जिस प्रस्ताव को छात्रों और फिल्म उद्योग से जुडे लोगों ने खारिज कर दिया है, उसे ज्यादातर बडे कलाकार नहीं मानेंगे। छात्रों के आंदोलन को मिल रहे व्यापक समर्थन की वजह से एफटीआईआई का निजीकरण करना सरकार के लिए फिलहाल तो मुश्किल ही होगा। शायद इसलिए यह कोशिश की जा रही है जिससे आम जनता यह मान ले कि आंदोलन कर रहे छात्रों में कोई प्रतिभा नहीं है, वे सरकार पर बोझ हैं या फिल्म उद्योग में निवेश करना पैसे की बर्बादी है।
(ऐना एमएम वेट्टिकाड 'द एडवेंचर्स ऑफ एन इनट्रेपिड फिल्म क्रिटिक' की लेखिका हैं। )