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एफडीआई पर वोटिंग के प्रस्ताव को रोकने में जुटी सरकार

Tue, 20 Nov 2012 12:33 AM IST
नई दिल्ली/ब्यूरो
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तृणमूल कांग्रेस के अविश्वास प्रस्ताव को लेकर विपक्ष में उत्पन्न मतभेदों से उत्साहित कांग्रेस और सरकार ने अब रिटेल में एफडीआई पर लोकसभा में वोटिंग नियम के तहत चर्चा नहीं होने देने की सियासी मोर्चेबंदी शुरू कर दी है। कांग्रेस ने साफ कहा है कि एफडीआई पर सरकार का फैसला संसद कें अधिकार क्षेत्र में नहीं है। संसद सिर्फ इस मसले पर बहस करवा सकती है। उधर, सरकार ने भी रिटेल में एफडीआई के फैसले को सरकार का प्रशासनिक फैसला बताकर वोटिंग की नौबत को टालने का दांव चला है।
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रिटेल में एफडीआई के विरोध में जुटते समर्थन के बड़े दायरे को लेकर सरकार परेशान है। सरकार को आशंका है कि अगर इस मामले पर लोकसभा में नियम 184 के तहत चर्चा के बाद वोटिंग होती है, तो वह सदन में औंधे मुंह गिर सकती है। लिहाजा, खुद को बदनामी से बचाने के लिए सरकार किसी भी सूरत में 184 के तहत वोटिंग रोकने की रणनीति पर काम कर रही है। सोमवार को कांग्रेस ने नियम 193 के तहत चर्चा कराने की पैरवी की। इसके तहत बहस तो होगी मगर वोटिंग का कोई प्रावधान नहीं है।

यूपीए सरकार रिटेल में एफडीआई से असहमत समर्थक दलों सपा और बसपा को अपने खिलाफ वोटिंग का कोई मौका नहीं देना चाहती। कांग्रेस प्रवक्ता संदीप दीक्षित ने कहा कि सरकार के प्रशासनिक फैसले के अधिकार पर संसद में वोटिंग नहीं होती। वैसे सरकार हर मुद्दे पर बहस के लिए तैयार है। सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने को लेकर वामपंथी गठबंधन के मुखिया प्रकाश करात ने जिस तरह अपना रुख जाहिर कर दिया है उसे विपक्ष में असमंजस और बंटवारे की नौबत दिख रही। माकपा नेता ने कहा है कि ऐसा करने की जरूरत नहीं है, क्योंकि सरकार के पास पर्याप्त संख्या बल है।
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विपक्षी दलों के इसी असमंजस को हवा देते हुए सरकार की ओर से रिटेल में एफडीआई के फैसले को प्रशासनिक बताकर इसे संसद के दायरे से बाहर बताया जा रहा है। सूचना और प्रसारण मंत्री मनीष तिवारी ने साफ कहा कि सरकार हर मुद्दे पर बहस के लिए तैयार है। लेकिन प्रशासनिक फैसलों पर संसद में वोटिंग गलत परंपरा है।
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