राजनीतिक दलों को सूचना के अधिकार (आरटीआई) के दायरे से बाहर रखने की कवायद में यूपीए सरकार अध्यादेश लाने पर गंभीरता से विचार कर रही है।
पार्टियों की अंदरूनी जानकारियों को सार्वजनिक करने के मुख्य सूचना आयुक्त (सीआईसी) के आदेश की काट तैयार करने में जुटी कांग्रेस अध्यादेश पर सहमति बनाने के लिए जल्द ही भाजपा समेत सभी दलों से बात करेगी।
अपनी गतिविधियों और फंडिंग की पारदर्शिता के विरोध में सभी राजनीतिक दल लामबंद होने के संकेत दे रहे हैं।
उच्चपदस्थ सूत्रों ने बताया कि कांग्रेस के रणनीतिकार इस मामले में पहल करने के पक्ष में हैं। अंदरखाने हो रही बातचीत में सभी दलों ने अध्यादेश पर सहमति के संकेत दिए हैं।
गौरतलब है कि सीआईसी ने इसी महीने आदेश जारी किया था कि सभी राजनीतिक दलों को आरटीआई कानून के दायरे में लाया जाए।
सीआईसी के मुताबिक इससे राजनीतिक दलों के काम काज में पारदर्शिता बढे़गी क्योंकि देश की जनता को यह अधिकार है कि वह पार्टियों के कामकाज और उसके पैसे के लेनदेन के बारे में जाने। लेकिन सीआईसी के इस आदेश से तिलमिलाई पार्टियां शुरू से ही इसका विरोध कर रही हैं।
हालांकि आम लोगों के बीच गलत संदेश जाने के अंदेशे से पार्टियां खुल कर सामने नहीं आ रही हैं।
इसके विरोध में सबसे मुखर रही कांग्रेस का मानना है कि राजनीतिक फंडिंग में पारदर्शिता के लिए आयकर कानून में संशोधन का उपाय पर्याप्त होगा।
इसके लिए दलों को आरटीआई के दायरे के भीतर लाने की जरूरत नहीं। कांग्रेस नेता जनार्दन द्विवेदी ने खुले तौर पर यह कह कर पार्टी के साथ सरकार का रुख भी साफ कर दिया था कि कांग्रेस कोई सरकारी संस्था नहीं। लिहाजा इसके आरटीआई कानून के दायरे में आने का सवाल ही नहीं उठता।
उधर माकपा और जदयू के मुताबिक सीआईसी खुद अपने मैंडेट से आगे जा कर काम कर रहा है। जदयू प्रमुख शरद यादव ने तो यहां तक कह दिया कि सीआईसी को देश की राजनीति की समझ नहीं। लिहाजा सरकार को इस मामले में हस्तक्षेप करना चाहिए।