वर्ष 2014 की चुनावी फसल को काटने के लिए लाया गया भूमि अधिग्रहण बिल एक फिर लोकसभा में लटक गया है। बिल को पारित कराने के लिए संसदीय कार्य मंत्री कमलनाथ का मैनेजमेंट भी काम नहीं आया।
विधेयक पर तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) ने जहां स्थायी समिति की मंजूरी का पेंच लगाया, वहीं अन्य विपक्षी और सरकार के सहयोगी दलों ने भी बगैर विस्तृत चर्चा के इस महत्वपूर्ण बिल पर अपनी मंजूरी देने से इंकार कर दिया। भाजपा, सपा और माकपा ने कहा कि इस बिल का अध्ययन किए बगैर वह अपनी राय नहीं दे सकते। इसके लिए समय चाहिए। जिसके बाद सरकार ने इस बिल पर चर्चा को बजट सत्र तक के लिए टाल दिया।
संसदीय कार्य मंत्री कमलनाथ ने कहा कि भूमि अधिग्रहण विधेयक पर विपक्ष और सरकार के सहयोगी दलों की ओर से चर्चा कराने के सुझाव को ध्यान में रखते हुए अब इस बिल पर बजट सत्र के दौरान चर्चा कराई जाएगी। तब तक यह बिल लोकसभा के पास ही रहेगा।
उन्होंने कहा यह बिल बहुत ही महत्वपूर्ण है। इसलिए सरकार चाहती है कि इसे सर्वसम्मति से पास कराया जाए। इसके पूर्व टीएमसी के सौगत राय ने कहा कि संसदीय समिति के सुझावों के बाद सरकार ने यह मसौदा तैयार किया है, लेकिन संशोधित मसौदे में सरकार ने समिति की सिफारिशों को कितनी जगह दी है इस पर गौर करना जरूरी है।
उन्होंने कहा कि समिति की सिफारिशों के बाद सरकार ने विधेयक में कई तरह के बदलाव भी किए हैं, जिस पर बिंदुवार चर्चा के बाद इसे दुबारा स्थायी समिति की मंजूरी के लिए भेजा जाना जरूरी है। स्थायी समिति की मंजूरी के बाद ही सरकार इस बिल पर दोनों सदनों में पेश करके मंजूरी ले सकती है।
भाजपा के वरिष्ठ नेता राजनाथ सिंह, सपा अध्यक्ष मुलायम सिंह और माकपा के बासुदेव आचार्य ने भी विधेयक को चर्चा कराए बगैर पास किए जाने का विरोध किया। मुलायम सिंह ने कहा कि वैसे भी देश में खेतिहर भूमि सिर्फ 30 फीसदी ही बची है। लिहाजा भूमि अधिग्रहण विधेयक के मौजूदा मसौदे का अध्ययन किए बगैर सहमति नहीं दी जा सकती है।