रोजगार की गारंटी, सूचना और शिक्षा के अधिकार के बाद अब सरकार आम लोगों को पीने योग्य पानी का अधिकार देने की तैयारी कर रही है।
अगर जल संसाधन मंत्रालय के प्रस्तावित नेशनल वाटर फ्रेमवर्क लॉ के मसौदे को मंजूरी मिली, तो राज्यों को प्रत्येक व्यक्ति को प्रतिदिन कम से कम 25 लीटर पीने योग्य जल उपलब्ध कराना होगा। शहरों में पीने के अतिरिक्त अन्य कार्यों में इस्तेमाल करने के लिए अलग से शोधित जल उपलब्ध कराया जाएगा।
विधेयक के मसौदे पर जल संसाधन एवं सिंचाई मंत्रियों के राष्ट्रीय फोरम की पहली बैठक में बुधवार को घंटों माथा पच्ची हुई। बैठक में जल की बर्बादी रोकने और वर्षा जल संरक्षण के लिए कठोर उपाय अपनाने पर सहमति बन गई है।
प्रस्तावित कानून का मसौदा केंद्रीय विश्वविद्यालय गुजरात के कुलपति डॉ. वाईके अलघ की अध्यक्षता वाली समिति ने तैयार किया है। इस मसौदे में जल की बर्बादी रोकने के लिए कई सिफारिश की गई है।
इसके अलावा जल की कीमत तय करने के लिए हर राज्यों को स्वतंत्र जल नियामक प्राधिकरण का गठन करना होगा। यह प्राधिकरण सरकार और स्थानीय निकायों से बातचीत कर जल की कीमत तय करेगा।
इस मसौदे पर जल संसाधन एवं सिंचाई मंत्रियों के राष्ट्रीय फोरम पर सहमति बनाने की पहल शुरू की गई है। इसके बाद कानूनी जामा पहनाने के लिए मसौदे को कैबिनेट की मंजूरी के लिए भेजा जाएगा।
केंद्रीय जल संसाधन मंत्री हरीश रावत के मुताबिक सरकार को बस इसके मसौदे पर राज्यों की सहमति का इंतजार है।
अलग-अलग तरह की जल आपूर्ति
पेय, कृषि तथा अन्य मद में इस्तेमाल के लिए अलग-अलग तरह के जल की आपूर्ति होगी। प्रतिदिन कम से कम 25 लीटर मिलने वाला पेयजल बेहद शुद्ध होगा, तो रसोई, कपड़े धोने और टॉयलेट के लिए पुनरावर्तित जल की आपूर्ति होगी। कृषि के लिए वर्षा और नदियों के जल की आपूर्ति होगी।
भरना होगा वाटर रिटर्न
मसौदे में जल का अंधाधुंध इस्तेमाल करने वाले उद्योगों पर भी सख्ती के प्रावधान किए गए हैं। प्रति वर्ष दस घन मीटर से अधिक जल का इस्तेमाल करने वाले उद्योगों को आयकर रिटर्न की तरह ही वाटर रिटर्न भरना होगा।
इन उद्योगों को यह जानकारी देनी होगी कि संबंधित वर्ष में उसने वर्षाजल का कितना संचय किया और इस्तेमाल किए गए जल का रिसाइकल कर कितना काम किया। ऐसे उद्योगों के लिए प्रतिवर्ष वर्षा जल संचय और पुनरावर्तित जल का एक लक्ष्य भी निर्धारित किया जाएगा।