तु्म्हें चोट लगती है और दर्द से बेटियां कराहती हैं, उनके हाथ छोटे हैं, पर लगता है जैसे मां सहलाती है।
किसी शायर के यह बोल बेटियों की शान में काढ़े गए कसीदे भले ही हों लेकिन पूर्वांचल के कई जिलों में बेटियों के नन्हें हाथों के इस खजाने को अपने गालों पर महसूस करने वाले शख्स कम ही हैं।
हो भी क्यों नहीं, एक तरफ जहां प्रदेश का औसत लिंगानुपात बढ़ा है वहीं पूर्वांचल के अधिकतर शहरों में लिंगानुपात घटा है। उससे भी शर्मनाक यह है कि पूर्वांचल के ही यह आने वाली पीढ़ी के लिए भी लिंगानुपात घटा के जा रहे हैं।
पूर्वी उत्तर प्रदेश के 20 में से 19 जिलों में 0-6 वर्ष के आयु वर्ग के लिंगानुपात में बड़ी गिरावट हुई है। जनगणना 2011 के यह प्रोवीजनल आंकड़े हमें जगाने के लिए काफी हैं कि हमने बेटियों की जिंदगी के साथ खेलना बंद नहीं किया तो जल्द ही लोग बहू के लिए तरस जाएंगे।
सबसे खराब हालात तो बलिया के यहां हैं। यहां लिंगानुपात में जहां 16 महिलाएं कम हुई हैं वहीं बच्चों के लिंगानुपात में 42 लड़कियों की कमी आई है। भोले की नगरी भी लिंगानुपात गिरने के मामले में पीछे नहीं रही है।
एक दशक में वाराणसी में महिलाओं और पुरुषों का अनुपात जितना बढ़ा नहीं, उससे अधिक तो 0-6 आयु वर्ग में लिंगानुपात घटा है। काशी में दस सालों में प्रति 1000 बालकों पर 34 बालिकाएं कम हुई हैं।
सोनभद्र, मिर्जापुर और जौनपुर में भले ही लिंगानुपात बढ़ा है लेकिन यहां भी बच्चों के लिंगानुपात में कमी आई है। जौनपुर में प्रति हजार लड़के पर 12, सोनभद्र में 31 और मिर्जापुर में 27 लड़कियां कम हुई हैं।
यह हालात तब हैं जब कन्या भ्रूण हत्या के खिलाफ दस सालों में कई अभियान चले, सरकारी एजेंसियों और स्वयंसेवी संस्थाओं ने करोड़ों खर्च करने के बाद खुद ही हालात सामान्य होने के लिए अपनी पीठ थपथपाई।
लेकिन जनगणना 2011 के आंकड़े अब तक की हुई सभी कवायदों की पोल खोल रहे हैं। अगर हम अब भी नहीं चेते और बेटियों को नहीं बचाया तो आने वाले समय में न समाज होगा, न देश होगा और न ही दुनिया होगी। हमें बेटी ही बचाएगी।