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अच्छे दिनों के इंतजार में ‘मां गंगा’

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मां गंगा के बुलावे पर वाराणसी को कर्म भूमि बनाने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का ड्रीम प्रोजेक्ट गंगा सफाई अभियान लॉंचिंग पैड पर भी नहीं पहुंच पाया है।
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तीन माह के कार्यकाल में घोषणाओं और बैठकों के अलावा उद्धार के नाम पर गंगा को कुछ नसीब नहीं हुआ है। सरकार बनते ही गंगा संरक्षण पर अलग मंत्रालय बनाए जाने की घोषणा कर तो दी गई, लेकिन महज एक माह पूर्व एक अगस्त को ही इसे अमली जामा पहनाया गया है।

गंगा संरक्षण मामलों की मंत्री उमा भारती को भी अहसास हो चला है कि विपक्ष से लेकर पूरे देश की निगाहें उनकी ओर लगी है। यही कारण है कि मोदी सरकार के सौ दिन पूरे से ठीक पहले वह गंगा एक्शन प्लान का खाका राष्ट्र के सामने रख सकती हैं।
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मैं न आया हूं न मुझे बुलाया है, मुझे तो मां गंगा ने बुलाया है। नामांकन के लिए वाराणसी पहुंचे पीएम मोदी के ये शब्द सिर्फ देशवासियों के कानों तक ही नहीं पहुंचे।

भारत से अच्छे संबंध रखने वाले दूसरे देशों ने भी इन पर गौर किया। फिर क्या था जर्मनी, ऑस्ट्रेलिया, इंग्लैंड, जापान से लेकर कनाडा तक ने पतित पावनि गंगा में अपनी आहुति डालने की मंशा भारत सरकार से जाहिर कर दी।

गंगा की सफाई के लिए पीएम के निर्देश पर पर्यटन, पर्यावरण, शिपिंग और शहरी विकास मंत्रालय एक साथ काम करेंगे। इन्हीं चारों मंत्रालयों को गंगा की सफाई पर एक्शन प्लान तैयार करने की जिम्मेदारी सौंपी गई।

इसी के तहत काशी को स्मार्ट सिटी बनाने को प्रधानमंत्री ने जापानी पीएम के साथ एमओयू पर भी हस्ताक्षर किया। गंगा नदी की सफाई और घाटों की मदद के लिए क्योटो की मदद ली जाएगी। अरुण जेटली ने बजट के दौरान भी स्वीकार किया था कि नदियों की सफाई पर भारी खर्च हो चुका है, लेकिन समन्वित प्रयासों की कमी के चलते सफलता नहीं मिली है।

इस कार्यकाल में नदियों को जोड़ने की परियोजना के तहत मध्य प्रदेश में केन-बेतवा नदी लिंक का नोटीफिकेशन जरूर जारी हुआ है। इसके अलावा सिर्फ घोषणाएं हुई हैं। चाहें वह गंगा के किनारे स्थित इंडस्ट्रीज की मॉनीटिरिंग के लिए सेंसर लगाने की बात हो या नदी के दोनों ओर पेड़ पौधे। अब तक किसी भी योजना के लिए फंड भी जारी नहीं किया गया है।

बीमार गंगा का इलाज भावना से नहीं सच्ची सेवा से होगा पूरा

प्रख्यात मशहूर जल संरक्षणविद् राजेंद्र सिंह गंगा की सफाई को लेकर मोदी सरकार के प्रयासों से संतुष्ट नहीं हैं। वह कहते हैं कि गंगा बीमार है पर मोदी सरकार इसके इलाज को गंभीर नहीं दिख रही है।

उनका मानना है कि गंगा को राष्ट्रीय नदी घोषित किया गया है तो उसका राष्ट्र सम्मान और संरक्षण भी उसी तर्ज पर होना चाहिए। वह साफ करते हैं कि जब तक गंगा और नदियों की सफाई को लेकर राष्ट्रीय कानून नहीं बनाया जाता है तब तक गंगा की सफाई कर पाना मुमकिन नहीं होगा।

कानून ऐसा बने की जो भी गंगा को गंदा करे उसकी सजा सुनिश्चित होगी। उनका कहना है कि जिस तरह की घोषणाएं मोदी सरकार की ओर से गंगा की सफाई के बारे में की गई हैं देशवासियों को वैसा होता हुआ कुछ भी नहीं दिख रहा है।

गंगा की सफाई पर मंत्रालयों को तो एक कर दिया गया लेकिन इन मंत्रालयों की रिपोर्ट अब तक सामने नहीं आई है। जब तक सरकार सीवर और रीवर की थ्योरी पर काम नहीं करेगी। उसे सफलता नहीं मिलेगी।

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सूने पड़े हैं गंगा के घाट

सरकार के एजेंडे में केदारनाथ से लेकर हरिद्वार, कानपुर, इलाहबाद, वाराणसी, पटना और दिल्ली के घाटों को उनकी मान्यताओं के अनुरूप रंगरूप दिया जाना है। इसके लिए सौ करोड़ की राशि निर्धारित की गई है। लेकिन अब तक कुछ नहीं हुआ।

फंड भी नहीं जुटा

सफाई के लिए एनआरआई गंगा फंड की स्थापना की गई है। विदेशों में बसे भारतीयों के जरिए इस कोष में फंड डलवाया जाएगा और गंगा की विशेष परियोजनाओं में इसे डाला जाएगा। लेकिन इस पर भी पहल नहीं हुई।

जल मार्ग कागजों में

1620 किमी वाला अंतरदेशीय जलमार्ग इलाहाबाद से शुरू होकर हल्दिया जाना है। 4200 करोड़ रुपये की यह योजना छह सालों में पूरा करने का लक्ष्य है।



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