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गंगा सफाई के लिए यूपी-उत्तराखंड को फंड देने पर रोक

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उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में गंगा सफाई को लेकर लापरवाही बरतने और प्रदूषण के स्रोतों को लेकर अपुष्ट जानकारी पर ऐतराज जताते हुए नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने केंद्रीय और राज्य स्तरीय प्राधिकरणों को फटकार लगाई है।
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एनजीटी ने सुनवाई के दौरान जल संसाधन मंत्रालय के जरिये नेशनल गंगा रिवर बेसिन अथॉरिटी (एनजीआरबीए) को गोमुख से लेकर कानपुर तक गंगा की सफाई को लेकर उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड को फंड देने के लिए मना कर दिया है।

ग्रीन बेंच ने कहा कि बिना हमारे आदेश के एनजीआरबीए फंड रिलीज नहीं करेगी। एनजीआरबीए का काम गंगा को स्वच्छ बनाना और नदी का संरक्षण करना है। इसे वर्ल्ड बैंक, केंद्र और राज्य फंड मुहैया कराते हैं।
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जस्टिस स्वतंत्र कुमार की अध्यक्षता वाली बेंच ने मंगलवार को एमसी मेहता मामले की याचिका पर सुनवाई के दौरान यह आदेश दिया। मामले की अगली सुनवाई 18 फरवरी को होगी।

सटीक जानकारी न देने से ग्रीन ट्रिब्यूनल खफा

सुनवाई के दौरान पर्यावरणविद व एडवोकेट एमसी मेहता ने कहा कि उत्तराखंड से निकलने वाले औद्योगिक अवशिष्ट और सीवेज गंगा को कितना प्रदूषित कर रहे हैं इस संबंध में कोई स्पष्ट जानकारी नहीं है।

साथ ही कितनी औद्योगिक और मानव जनित गंदगी उत्तराखंड में पैदा होती है जो गंगा के जरिये उत्तर प्रदेश में नदी के साथ विभिन्न प्रवेश बिंदुओं पर संगम करती है इस पर भी कोई स्पष्ट  आंकड़ा नहीं है।

इस मामले में भी कोई पुख्ता जानकारी नहीं है कि उत्तराखंड से नदियों के साथ कितनी गंदगी उत्तर प्रदेश आती है या उत्तर प्रदेश से पैदा होने वाली औद्योगिक व सीवेज की कितनी मात्रा यहां से नदी में मिलकर आगे के राज्यों में जाती है।

इस दौरान एमसी मेहता ने सुझाव दिया कि दोनों राज्य अपनी-अपनी औद्योगिक व सीवेज की गंदगी को खुद संभालें, साथ ही इसके लिए पर्यावरण मंत्रालय, जल संसाधन मंत्रालय, एनजीआरबीए, केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, राज्यों के प्रदूषण बोर्ड व अन्य प्राधिकरण मिलकर जांच करें। उन्होंने कहा कि उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश में बढ़ते शहरीकरण की वजह से उद्योगों का कचरा और सीवेज गंगा में बहाया जा रहा है।

उन्होंने कहा कि इस संबंध में कोई आंकड़ा नहीं है और राज्य एक दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप का खेल खेल रहे हैं। मेहता ने कहा कि पर्यावरण मंत्रालय, राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और अन्य प्राधिकरण हर राज्य की ओर से पैदा किए जा रहे प्रदूषण का पता करें और फिर इस हिसाब से इसका निपटारा करें।

दरअसल गंगा में प्रदूषण की असली वजह इसमें गिराया जाने वाला औद्योगिक कचरा है। इसलिए ग्रीन ट्रिब्यूनल ने केंद्र से कहा है कि वह हरिद्वार से कानपुर तक गंगा सफाई की व्यवस्था स्पष्ट करे।

एनजीटी ने मांगी रिपोर्ट

एनजीटी ने दोनों राज्यों को उत्तराखंड के गंगा के अंतिम बिंदु और यूपी में प्रवेश बिंदुओं के साथ अन्य जगहों पर औद्योगिक कचरा फेंके जाने और सीवेज प्रदूषण की जांच कर रिपोर्ट तैयार करने के निर्देश दिए हैं।

क्या है एनजीआरबीए
जल संसाधन मंत्रालय गंगा को निर्मल करने के लिए एनजीआरबीए का गठन किया है। एनजीआरबीए गंगा की सफाई का काम देखने वाली सर्वोच्च निकाय है। नेशनल मिशन फॉर क्लीन गंगा यानी एनएमसीजी नमामि गंगा परियोजना को लागू करने वाली एजेंसी हैं।

एनजीआरबीए का दायरा उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल और अन्य दूसरे राज्यों तक है जहां गंगा और उसकी सहायक नदियां प्रवाहित होती हैं। कई चरणों में बंटी है सफाई योजना एनजीटी ने गंगा सफाई के काम को कई चरणों में बांट दिया है।

इसमें गोमुख से हरिद्वार, हरिद्वार से कानपुर, कानपुर से यूपी की सीमा, यूपी की सीमा से झारखंड और झारखंड से लेकर बंगाल की खाड़ी तक गंगा सफाई का काम शामिल है।
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गंदगी फैलाने पर दंड

गंगा को साफ रखने के मकसद से ट्रिब्यूनल ने 11 दिसंबर, 2015 के एक फैसले में गोमुख से हरिद्वार तक प्लास्टिक के इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगा दिया। यह प्रतिबंध 1 फरवरी 2016 से लागू हो जाएगा। वहीं गंगा में गंदगी फेंकने पर इस इलाके के होटलों, धर्मशालाओं और आश्रमों पर हर दिन 5000 रुपये जुर्माना लगाया जाएगा।

नमामि गंगे योजना
जुलाई 2014 के केंद्रीय आम बजट में मिशन नमामि गंगे की घोषणा की गई।
8 सितंबर 2014 : प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पहली बार गंगा सफाई पर उच्च स्तरीय बैठकें कीं।
6 जनवरी 2015 : प्रधानमंत्री ने दूसरी बार उच्च स्तरीय बैठकें कीं।
27 अक्टूबर 2014 और 26 मार्च 2015 : पुनर्गठित एनजीआरबीए की बैठक हुई
13 मई 2015 : केंद्रीय मंत्रिमंडल ने नमामि गंगे प्रोजेक्ट के लिए 20,000 करोड़ रुपये के बजट को मंजूरी दी।
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