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अध्यक्ष न रहे तो संकट में होगा गडकरी का भविष्य

Wed, 07 Nov 2012 03:49 PM IST
नई दिल्ली/इंटरनेट डेस्क
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भाजपा की कोर कमेटी ने भ्रष्टाचार के मुद्दे पर नितिन गडकरी को क्लीनचिट दे कर उनकी कुर्सी बचा ली है लेकिन कल की बैठक में पार्टी के वरिष्ठ नेता लाल कृष्ण आडवाणी का नदारद रहना कई सवाल खड़े कर गया है।
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माना जा रहा है कि गडकरी को ‘दीवाली गिफ्ट’ के रूप में भले ही अभयदान मिल गया हो, लेकिन भविष्य में कोई न कोई धमाका जरूर हो सकता है। कयास यह भी लगाए जा रहे है कि अगर गडकरी अध्यक्ष पद से हटे तो उन्हें अपने गृहराज्य महाराष्ट्र की राजनीति में भी दखल नहीं मिलेगा।

महाराष्ट्र की राजनीति के जो समीकरण हैं, वह इस अंदेशे को पुख्ता भी करते हैं। दरअसल गडकरी ब्राह्मण समुदाय से आते हैं, जो राज्य के कुल मतदाताओं का महज चार फीसदी हैं। महाराष्ट्र की राजनीति में मराठों, पिछड़ों और दलितों का वर्चस्व रहा है लेकिन ब्राह्मण हाशिए पर ही रहे हैं।
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यह वजह है कि राज्य में अब तक केवल एक ब्राह्मण मनोहर जोशी ही मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंच सके हैं। हालांकि उसमें शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे की भूमिका महत्वपूर्ण रही है। महाराष्ट्र में भाजपा की पिछड़ी जातियों के बीच ही मजबूत पैठ रही है। राज्य की राजनीति में गोपीनाथ मुंडे जैसे पिछड़े वर्ग के नेता ही नेतृत्व में रहे हैं।

पिछड़े वर्ग के वोट बैंक को लुभाने के लिए ही पार्टी ने मुंडे को 2014 के विधानसभा चुनाव का नेतृत्व भी सौंपा है। पर्यवेक्षकों का मानना है कि आगामी विधानसभा चुनाव के मद्देनजर भाजपा इस रणनीति में कोई बदलाव भी नहीं करेगी। ऐसे में राष्ट्रीय अध्यक्ष की गद्दी से उतरने के बाद महाराष्ट्र की राजनीति में गडकरी की कोई भूमिका बचेगी, यह कहना मुश्किल है।

बैठक से क्यों रूठे आडवाणी
नितिन गडकरी की अध्यक्षता के मुद्दे पर कल हुई भाजपा की विस्तारित कोर कमेटी की बैठके से लालकृष्ण आडवाणी नदारद रहे। माना जा रहा है कि राम जेठमलानी के बाद भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी भी चाहते हैं कि गडकरी को इस्तीफा देना चाहिए। हालांकि उन्होंने स्पष्ट तौर पर कोई बयान नहीं दिया है।

कोर कमेटी की बैठक में शमिल होने के लिए अनंत कुमार व सुषमा स्वराज द्वारा आडवाणी जी की मान मनौव्वल भी की गई लेकिन वह नहीं माने। सूत्रों के अनुसार गडकरी के खिलाफ जेठमलानी की मुहिम में ताल ठोक रहे जसवंत सिंह, यशवंत सिन्हा आदि नेता अब आडवाणी को यह मनाने में जुटे हैं कि उन्हें फिर से भाजपा को सीधे अपने नियंत्रण में ले लेना चाहिए।

दरअसल भ्रष्टाचार के मुद्दे पर आडवाणी की राय स्पष्ट है। उनका मानना है कि जिस तरह से भाजपा अध्यक्ष पर लगातार भ्रष्टाचार के आरोप लग रहे हैं, उसे देखते हुए उन्हें स्वयं ही पद से इस्तीफा दे देना चाहिए। इसके पूर्व कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री येदुरप्पा के मामले में भी जब पार्टी के ज्यादातर सदस्य उनके साथ थे, तब भी आडवाणी की राय दूसरों से अलग थी और वे येदुरप्पा का इस्तीफा चाहते थे।
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