भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी का भविष्य अब गुजरात व हिमाचल प्रदेश के चुनाव नतीजों पर भी टिका है। माना जा रहा है कि यदि इन चुनावों के नतीजे उम्मीद के अनुरूप नहीं हुए तो दोबारा ताजपोशी की बाट जोह रहे गडकरी पर इस्तीफे का दबाव बढ़ सकता है। ऐसे में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी के खेमे के बीच भाजपा संगठन पर प्रभुत्व के लिए खींचतान तेज होने की पूरी आशंका है।
भाजपा भले ही अभी गडकरी के साथ खड़ी हो, लेकिन पार्टी के भीतर सब कुछ शांत नहीं है। संघ, खासतौर पर महाराष्ट्र लॉबी अब भी गडकरी के साथ है और उनकी दोबारा ताजपोशी के लिए प्रयासरत है। मगर आडवाणी खेमा किसी भी सूरत में गडकरी को दोबारा पार्टी की कमान सौंपने के पक्ष में नहीं है।
पार्टी अध्यक्ष पद से गडकरी की विदाई की स्थिति में लोकसभा में विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज, राज्यसभा में विपक्ष के नेता अरुण जेटली से लेकर पूर्व अध्यक्ष डा. मुरली मनोहर जोशी व राजनाथ सिंह के नामों पर अटकलें तेज होती जा रही हैं। इनके साथ नरेंद्र मोदी का नाम भी शामिल है।
सूत्रों के अनुसार आडवाणी पहले तो सुषमा का नाम आगे बढ़ा रहे थे, लेकिन अब जसवंत सिह और यशवंत सिन्हा खुद आडवाणी को पार्टी की कमान थामने का आग्रह कर चुके हैं। इधर, मोदी अभी जेटली के पक्ष में हैं। जबकि संघ किसी भी सूरत में दिल्ली की राजनीति करने वाले इन नेताओं के पक्ष में नहीं है।
भाजपा के नेता भी मानते हैं कि यदि हिमाचल में चुनाव नतीजे पार्टी के पक्ष में नहीं रहते हैं और गुजरात में सीटें अथवा वोट घटता है तो इसका ठीकरा गडकरी के सर फोड़ा जाना लगभग तय है। उम्मीद के अनुरूप नतीजे नहीं आने पर विरोधी खेमे को यह कहने का मौका मिल जाएगा कि चुनाव के ऐन मौके पर गडकरी पर भ्रष्टाचार के आरोप उछलने से ही पार्टी के खिलाफ माहौल बना। इससे गडकरी की दोबारा ताजपोशी तो दूर उन पर इस्तीफे का दबाव भी बढ़ सकता है। इससे नये अध्यक्ष को लेकर पार्टी के भीतर जारी घमासान के इन चुनावों के बाद तेज होने की पूरी संभावना है।