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जानिए, एक क्लिक में पूरी कहानी, 'एक था सरबजीत'

Fri, 03 May 2013 02:01 AM IST
चंडीगढ़/ब्यूरो
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यह कहानी तब शुरू होती है, जब पंजाब में आतंकवाद चरम पर था। पाकिस्तान से लगती पंजाब की सरहद पर तब कंटीली बाड़ नहीं थी। ...पर सरहद के पार संगीनें तनी थीं और दिलों में नफरत के कांटे थे।
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आतंकवाद पाकिस्तान की रणनीति का हिस्सा था और हमारी ओर से रास्ता भटक कर सरहद पार कर जाने वाले लोगों को नई पहचान का मुखौटा पहना कर रॉ का जासूस और दहशतगर्द बता दिया जाता था।

पड़ोसी देश की ऐसी ही नफरत का शिकार हुआ तरनतारन के पाक सीमा से सटे गांव भिखीविंड का सरबजीत। यह कहानी सरहद के दोनों ओर चलती है।

एक ओर वह सीधा साधा गरीब किसान है और सरहद के दूसरी ओर उसे 23 साल जेल में तड़पाने के बाद क्रूरता से मार दिया जाता है। यह कहानी कुछ इस तरह है-

भारत में

28 अगस्त 1990 : एक आम किसान
सरबजीत की पत्नी सुखजीत कौर के अनुसार रोज की तरह ही उस दिन भी उसका पति घर से हल लेकर पाकिस्तान सीमा के पास स्थित खेत पर जुताई के लिए गया था। मगर फिर कभी नहीं लौटा।
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परिवार के लोग इंतजार करने के बाद शाम को खेत पर गए तो वहां सिर्फ उसका हल था। परिजन रिश्तेदारियों में उसकी तलाश करते रहे। करीब 9 महीने तक उसकी कोई खबर नहीं मिली।

जून 1991 : पहली सूचना
गांव भिखीविंड में डाकिया सरबजीत के घर एक पत्र लेकर आया। यह पाकिस्तान की कोट लखपत जेल से आया था और सरबजीत सिंह का ही लिखा हुआ था।

इसमें उसने बताया था कि वह शराब के नशे में उस शाम बॉर्डर पार कर गया था और पाकिस्तान बॉर्डर फोर्स ने उसे पकड़ लिया था। इस पत्र से ही परिजनों को उसके पाकिस्तान में कैद होने की जानकारी मिली।

यह जानकारी मिलने के बाद दलजीत कौर ने अपने भाई को बचाने के लिए भागदौड़ शुरू की। उनका यह प्रयास एक ऐसी मुहिम बना जिसे देश विदेश ही नहीं पाकिस्तान की सिविल सोसाइटी से भी समर्थन मिला।

पाकिस्तान में

28 अगस्त 1990 : भटक कर आया नागरिक
पाकिस्तान बार्डर गार्ड्स ने कसूर के नजदीक भारत से लगती सीमा पर नशे की हालत में एक युवक को गिरफ्तार किया। यह युवक सरहद से करीब दस किलोमीटर की दूरी पर स्थित गांव भिखीविंड का सरबजीत था।

उसे अवैध तरीके से सीमा पार करने के आरोप में गिरफ्तार कर कसूर पुलिस को सौंप दिया गया। हालांकि पाकिस्तान पुलिस की ओर से उसकी गिरफ्तारी 30 अगस्त की दिखाई गई और कोर्ट में सरबजीत का जो लिखित बयान दर्ज कराया गया उसमें यह बताया गया कि वह 29 अगस्त को सरहद पार आया था।

5 सितंबर 1990 : आठ दिन में बदल दी पहचान
भारतीय नागरिक के पकड़े जाने की सूचना पुलिस अधिकारियों को मिली। उन्होंने सरबजीत को एक मनघड़ंत पहचान देते हुए रॉ का जसूस मनजीत सिंह बताया।

साथ ही उसे तीन माह पहले लाहौर और फैसलाबाद में हुए सिलसिलेवार चार विस्फोटों का मुख्य आरोपी माना। इन विस्फोटों में 14 लोगों की मौत हुई थी।

उस पर आतंकवाद फैलाने और भारत का जासूस होने के आरोप में मुकदमा दर्ज किया गया।

1991 : मौत की सजा
पाकिस्तान के आर्मी एक्ट के तहत सरबजीत को मौत की सजा सुनाई गई। हालांकि सजा सुनाने से पहले अदालत ने उसकी पहचान तक पुष्ट कराने की जरूरत तक नहीं समझी।

इस मामले में दर्ज हुई एफआईआर तक में कहीं सरबजीत का नाम नहीं था। उसे मंजीत सिंह के नाम से ही सजा सुनाई गई। हाईकोर्ट ने भी मौत की सजा बरकरार रखी।

मार्च 2006 : वकील तारीख पर ही नहीं पहुंचा
सजा के खिलाफ पाकिस्तान के सुप्रीम कोर्ट में दी गई पुनर्विचार याचिका भी एक औपचारिकता भर रही और सुप्रीम कोर्ट ने इस याचिका को सिर्फ इसलिए खारिज कर दिया क्योंकि सरबजीत का वकील ही तारीख पर पेश नहीं हुआ।

3 मार्च 2008 : मुशर्रफ को दया न आई
इसके बाद पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ ने भी गलत पहचान के चलते एक निर्दोष को मौत की सजा सुनाने के तर्क पर ध्यान नहीं दिया और दया याचिका खारिज कर दी।

26 अप्रैल 2008  : मुख्य गवाह पलटा
सरबजीत के खिलाफ केस में मुख्य गवाह बनाए गए शौकत सलीम ने सरबजीत के खिलाफ केस को झूठा बताया। उसने अपने पहले के बयान कि बम प्लांट करने वाले लोगों में सरबजीत था को पुलिस के दबाव में दिया गया बयान बताया। सलीम के पिता और रिश्तेदार इन धमाकों में मारे गए थे।

28 मई 2012 : जरदारी को याचिक
सरबजीत की ओर से राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी को एक बार फिर से सजा के खिलाफ दया याचिका भेजी गई।

पाकिस्तान में बदलते माहौल के और दुनिया भर में सरबजीत के समर्थन में चल रहे अभियानों को देखते हुए उसकी रिहाई की उम्मीद बंधने लगी।

26 जून 2012 : फिर धोखा
राष्ट्रपति आसिफ जरदारी की ओर सरबजीत की रिहाई के आदेश जारी करने की खबर मीडिया में आई। पाकिस्तान के कट्टरपंथी संगठनों जमात-ए-इसलामी और जमात-उद-दावा ने इसकी निंदा की और सरबजीत की जगह एक अन्य भारतीय नागरिक सुरजीत सिंह को रिहा कर दिया गया।

26 अप्रैल 2013 : जेल में हमला
लाहौर की कोटलखपत जेल में बंद सरबजीत पर छह कैदियों ने ईंटों, चाकुओं, राड से हमला कर बुरी तरह से घायल कर दिया। वह गहरे कोमा में चला गया।

1 और 2 मई की रात 2013: शहीद
आधी रात डेढ़ बजे जिन्ना अस्पताल के डॉक्टरों ने सरबजीत को मृत को घोषित कर दिया। एक 26 साल का हट्टा-कट्टा नौजवान जो 23 साल पहले भूल से सरहद पार कर गया था वह एक शव के रूप में वापस लौटा।
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