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क्या शार्ली एब्डो ने भी पाखंड किया था?

Sun, 11 Jan 2015 05:45 PM IST
आकार पटेल/ बीबीसी
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जहाँ तक मुझे याद है, मेरे पुराने बॉस एमजे अकबर का पत्रकारिता में एक ही नियम है। उनके नियम के बारे में मुझे सरल शब्दों में कहना हो तो कहूँगा, "किसी भी चीज के बारे में जो चाहे वो लिखो, लेकिन कभी भी धर्म का मजाक मत बनाना।"
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मुझे नहीं पता कि उन्होंने क्या सोच कर ये कहा था? क्या वो चाहते थे कि उनका अखबार धर्म का सम्मान करे, या वो हमारे देश में धर्म का मजाक उड़ाने से सामने आने वाली मुश्किलों से बचना चाहते थे? शायद उन्हें दोनों बातों का ध्यान था।

फ्रांसीसी पत्रिका शार्ली एब्डो पर हुए हमले के बारे में बिज़नेस स्टैंडर्ड अखबार में टीएन निनान ने लिखा, "बहुत से समाज, ख़ासकर वो जो पश्चिमी प्रबोधन (एनलाइटमेंट) का हिस्सा रहे हैं, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर शायद ही कोई पाबंदी लगाते हैं, अगर लगाते भी हैं तो बहुत ही मामूली।
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ये समाज अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के तहत किसी को 'आहत करने की स्वतंत्रता' को भी मान्यता देते हैं। फ्रांसीसी क्रांति के दौरान 'अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता' के अधिकार को 'मनुष्य के अधिकारों की घोषणा' के 'सबसे महत्वपूर्ण अधिकारों' में एक माना गया था।"

सर्व धर्म समभाव

हालांकि निनान ने यह भी कहा, "सर्व धर्म समभाव की व्यापक परंपरा के चलते, यह जानते हुए कि इससे लाखों लोगों की भावनाएँ आहत होंगी, किसी भारतीय प्रकाशन द्वारा ऐसा कोई कार्टून (पैगंबर मोहम्मद का) छापने की कल्पना करना थोड़ा मुश्किल है।"

यह सच है, और अगर कोई दुस्साहसी संपादक ऐसा करने की सोचे भी तो इससे पैदा होने वाली मुश्किलों के मद्देनज़र ऐसा नहीं करेगा। इन मुश्किलों में केवल हिंसा और धमकी ही नहीं, क़ानूनी दिक्कतें भी शामिल हैं।

भारत का 'अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता' से उतार-चढ़ाव भरा नाता रहा है। भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू तक इस बुनियादी अधिकार के संग किए जाने वाले बर्ताव को लेकर अस्पष्ट थे।

26 जनवरी, 1950 को भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19(1)(अ) में भारतीय नागरिकों को 'अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता' का अधिकार दिया गया। 15 महीनों बाद नेहरू इससे पीछे हट गए और उन्होंने इस पर पाबंदियां लगा दीं।

आजादी पर अंकुश

करीब आधा दर्जन क़ानून भारत में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर अंकुश लगाते हैं। इनमें से कई तो अजीब हैं। निनान ने अपने लेख में लिखा है, "भारत का रवैया ज्यादा परिष्कृत है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, यहां मौलिक अधिकार तो है, लेकिन एक असीमित अधिकार नहीं है।

भारतीय संविधान इस अधिकार को 'शांति व्यवस्था बनाए रखने' के साथ-साथ 'शालीनता और नैतिकता' के आधार पर सीमित करता है। इन सभी पदों की कई व्याख्याएं संभव हैं। आख‌िर क्यों, ऐसा कोई लेख जिससे पड़ोसी देशों से संबंध खराब हो सकता है, निषेध है। सैद्धांतिक मुद्दे से अलग एक व्यावहारिक दिक्कत यह है कि कौन से देश मित्र हैं, और कौन से देश मित्र नहीं हैं इसकी कोई आधिकारिक सूची नहीं है।"

धार्मिक हिंसा भड़काने, शत्रुता को बढ़ावा देने, धर्म का अपमान करने और धार्मिक भावनाओं को आहत करने को लेकर विशेष कानून हैं। लेकिन इनमें से कोई भी कानून नया नहीं है।

अंग्रेजों का कानून

'अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता' पर अंकुश लगाने वाला क़ानून सन् 1837 में बना था। महज 33 साल की उम्र में थॉमस मैकाले ने भारतीय दंड संहिता तैयार करना शुरू किया।

उसके बाद अगले 175 सालों तक कमोबेश यह काम ज़ारी रहा। यह बताता है कि आधुनिकता की सजधज के बीच जीने के बावजूद हमारी संस्कृति में कितने कम बदलाव होते हैं। यह औपनिवेशिक कानून आज़ाद भारत में भी जारी रहा।

अंग्रेज़ होकर भी उन्होंने हमारा बहुत सटीक मूल्यांकन किया था, उन्होंने हमारे बरताव और बाहरी उत्प्रेरकों के प्रति हमारी प्रतिक्रिया के बारे में सही अनुमान लगाया था।

इसीलिए मैकाले एक महान इंसान थे। वो पूरे आत्मविश्वास के साथ ही सन् 1837 में ही बता सकते थे कि सन् 1984, 1993 और 2002 में हममें से बहुत से लोग कितने वहशी हो जाएंगे।

भारतीय संविधान में महान और सार्वभौमिक वादे किए गए, लेकिन ये वादे भारत की जमीनी सांप्रदायिक हिंसा की भेंट चढ़ गए।

काला-सफेद

'अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता' की बहस में सबसे आगे रहने वाले पत्रकारों के लिए इस मुद्दे को काले-सफ़ेद में बांट कर देखना आसान नहीं है। मुझे नहीं पता था कि शार्ली एब्डो ने अपने एक पत्रकार को एंटी-सेमेटिज्म (सेमेटिक धर्म के विरोध) के लिए नौकरी से निकाल दिया था। इस्लाम पर हमला करने को लेकर पत्रिका के उत्साह को देखते हुए मुझे यह जानकर आश्चर्य हुआ था।

'द डेली टेलीग्राफ' ने साल 2009 में खबर दी थी कि साइने उपनाम वाले 80 वर्षीय मॉरिस साइनेट को अपने स्तंभ में 'नस्ली हिंसा उकसाने' के लिए नौकरी से निकाल दिया गया था।

उनके लेख से पेरिस के बौद्धिक वर्ग में काफी हलचल मची और आखिरकार उन्हें पत्रिका से निकाल दिया गया। फ्रांस के तत्कालीन राष्ट्रपति निकोलस सर्कोजी के 22 वर्षीय बेटे की इलेक्ट्रॉनिक सामान बनाने वाले यहूदी कारोबारी की बेटी सिबाउन-डार्टी से सगाई होने पर साइने ने टिप्पणी की थी। उन्होंने सर्कोजी के बेटे के यहूदी बनने की अफ़वाहों के आधार पर टिप्पणी की, "वो नन्हा छोकरा, ज़िंदगी में बहुत दूर जाएगा।"
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शार्ली एब्डो के संदेह

एक वरिष्ठ राजनीतिक टिप्पणीकार ने उनके स्तंभ को यहूदियों और सामाजिक सफलता के बारे में पूर्वाग्रह से भरा हुआ बताकर उसकी आलोचना की। शार्ली एब्डो के संपादक फ‌िलिप्पे वैल ने साइने से माफी मांगने के लिए कहा, लेकिन उन्होंने मना कर दिया और कहा, "इससे बेहतर मैं अपने अंडकोष काट लूँगा।"

साइने को निकाले जाने के वैल के फैसले का कई प्रमुख बुद्धिजीवियों ने समर्थन किया था, जिनमें दार्शनिक बर्नार्ड-हेनरी लेवी भी शामिल थे। हालांकि लिबरटेरियन वामपंथियों ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हवाला देते हुए साइने का बचाव किया था।

यह एक पाखंड जैसा लग सकता है, लेकिन हम सबकी तरह शार्ली एब्डो के भी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लेकर अपने कुछ संदेह थे।
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