भाजपा ने खाद्य सुरक्षा बिल को ‘वोट सुरक्षा विधेयक’ करार देते हुए कहा कि इसे छत्तीसगढ़ के मॉडल पर बदलने की आवश्यकता है।
पार्टी के वरिष्ठ नेता डॉ. मुरली मनोहर जोशी ने कहा कि सत्ता में आने के साढ़े चार साल बाद यूपीए सरकार एक आधे अधूरे विधेयक को ऐसे समय में लाई है जब उसके सत्ता से जाने का समय आ गया है।
विधेयक पर चर्चा की शुरुआत करते हुए डॉ. जोशी ने कहा कि इस बिल को लेकर देश-दुनिया में जितना हल्ला मचाया गया, यह उसके ठीक उलट है।
भाजपा शासित छत्तीसगढ़ मॉडल को अपनाने पर जोर देते हुए डॉ. जोशी ने आरोप लगाया कि सरकार लोकलुभावना बिल बनाकर जनता को सब्जबाग दिखा रही है। उन्होंने विधेयक की खामियां गिनाते हुए कहा कि इसमें छह माह से तीन साल के बच्चे को भी शामिल किया गया है।
भाजपा नेता ने पूछा कि क्या उन्हें भी गेहूं और चावल दिया जाएगा अथवा बहुराष्ट्रीय कंपनियां उनके लिए भोजन तैयार करेंगी।
डॉ. जोशी ने कहा कि बिल की चर्चा के बाद से ही बहुराष्ट्रीय कंपनियों के विज्ञापन आने शुरू हो गए हैं। उन्होंने कहा कि गर्भवती महिलाओं को प्रोटीनयुक्त भोजन देने के लिए क्या उन्हें दाल पिलाएंगे अथवा बड़े ठेकेदार ही उन्हें भोजन देंगे।
डॉ. जोशी ने सरकार के ही आंकड़े दिखाकर कहा कि कृषि मंत्रालय की 2009 की रिपोर्ट में कहा गया है कि गांवों में ग्रामीण गरीब व्यक्ति की प्रति माह अनाज की खपत 9.8 किलो है, लेकिन विधेयक में मात्र पांच किलो देने की बात कही गई है जो प्रति व्यक्ति प्रतिदिन 166 ग्राम बनता है।
उन्होंने कहा कि विधेयक में प्रति व्यक्ति की जगह परिवार को आधार बनाया गया है, ऐसे में एक व्यक्ति का परिवार माना जाएगा कि नहीं। बच्चों और बड़ों का राशन एक समान कर दिया गया है।
उन्होंने कहा कि सरकार तैयार रेडीमेड फूड देने और स्नैक्स आदि घर तक पहुंचाने की बात करती है। गांव में तो ऐसा भोजन तैयार नहीं होता है।
सरकार मिड-डे मील योजना तो ठीक से लागू नहीं कर पा रही है और सभी को घर तक भोजन पहुंचाने की बात कर जनता को गुमराह करने का काम कर रही है।