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5 कारण, आपके लिए बेमतलब क्यों है आम बजट?

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भारत का बजट सोमवार को आ रहा है। लगभग हर टीवी चैनल, हर अखबार बजट की खबरों से रंगे हुए हैं। पर आम आदमी के लिए यह कवरेज और बजट बेतुका है। पर क्यों? इसके पाँच बड़े कारण निम्न हैं।
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वित्तीय घाटा: सारे वित्तमंत्री और विशेषज्ञ बजट में वित्तीय घाटे के बारे में खूब बोलते हैं। भारत की सभी सरकारें साल 2008 तक कानूनन देश के वित्तीय घाटे को कम कर सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के तीन फीसदी के बराबर लाने के लिए बाध्य थीं। ऐसा फिस्कल रिस्पॉन्सिबिलिटी एंड बजट मैनेजमेंट एक्ट 2003 के तहत किया जाना था।

लेकिन सरकारें ऐसा नहीं करतीं। वो संसद से इस सीमा को लांघने की इजाजत ले लेती हैं। पिछली बार जेटली ने भी यही किया था। वो इस बार फिर ऐसा कर सकते हैं। उनके पहले भी ऐसा हुआ है। जब संसद के पास किए कानून को सांसद आगे खिसका देते हैं और साल भर में वित्तीय घाटे के टारगेट रिवाइज होते हैं, बजट कि ओर क्यों ताकें?
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सबसे बड़ी समस्या है महंगाई

महंगाई: सरकारें साल के बीच में सेस या अधिभार लागू कर पैसा वसूलती हैं। इससे महंगाई बढ़ती है। हालिया उदाहरण है स्वच्छ भारत अधिभार। सरकार ने यह सेस नवंबर में लगाया। जनता की जेब से फरवरी तक 1,917 करोड़ रुपए निकल कर सरकार की तिजोरी में चले गए। इसी तरह से बीते दिसंबर में किराए बढ़ा दिए गए।

कच्चे तेल की अंतरराष्ट्रीय कीमतों में आई भारी गिरावट से हो रही बचत का 70-75 फीसद हिस्सा (डीजल और पेट्रोल पर टैक्स बढ़ाकर) सरकार खुद अपनी तिजोरी में रख रही है। जबकि इसका 25-30 फीसद हिस्सा पेट्रोल और डीजल की कीमतों में कम करके जनता को दिया जा रहा है। अगर कीमतें और कम की जातीं तो इससे महंगाई भी कम होती, खाद्य पदार्थों की, क्योंकि ट्रांसपोर्ट लागत में डीजल की कीमतों का अहम हिस्सा होता है।

भारत के इतिहास में पहली बार ऐसा हो रहा है कि होलसेल प्राइस इंडेक्स पिछले 15 महीनों से नकारात्मक रहा है। लेकिन उपभोक्ता मूल्य सूचकांक बढ़ रहा है। सरकार ने ये सब तो नहीं बताया था बजट में कि ऐसा करेंगे। अब बताइए, बेचारे आम आदमी के लिए बजट हुआ ना बेमतलब का।

करोड़ो नहीं देते हैं टैक्स

आयकर: लेकिन हर अखबार, टीवी यहाँ तक की एफएम तक टैक्स में छूट। टैक्स में छूट चिल्लाते हैं लेकिन 120 करोड़ से ज्यादा लोगों के इस मुल्क में 97 फीसदी लोग आयकर या इनकम टैक्स नहीं देते हैं।

अप्रत्यक्ष कर: आम आदमी के लिए उत्पादन कर, सेवा कर जैसे या इस तरह की दूसरी ड्यूटी महत्व रखती है। इससे उसके इस्तेमाल की चीजें सस्ती या महंगी होती हैं। इससे इतर समझने की बात यह है कि हर वित्त मंत्री बताता है कि देंगे क्या, पर ये सब छुपा जाते हैं कि लेंगे क्या। मसलन उत्पादन कर सरकार ने बार-बार बढ़ाया। पिछले साल अप्रैल से दिसंबर के बीच अप्रत्यक्ष करों से वसूली करीब 33 फीसदी बढ़ी। ऐसा नहीं कि इस दौरान देश में उत्पादन बढ़ा हो। सरकार ने खुद बताया कि देश में उत्पादन कम हुआ है।

ग्रामीण अर्थव्यवस्था: इस बार तय है कि वित्त मंत्री अरुण जेटली जी बजट में जोर शोर से बताएंगे कि वो किसानों के लिए, गाँवों में रहने वाले भूमिहीन मजदूरों के लिए ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए क्या हैं।
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मजबूत होगी ग्रामीण अर्थव्यवस्था?

पिछली बार भी बताया था लेकिन बाद में हुआ क्या? बजट में वित्त मंत्री ने कहा था कि महात्मा गांधी ग्रामीण रोजगार योजना (मनरेगा) बजट में भले कम पैसे का प्रावधान किया हो। लेकिन बाद में पैसे की कमी नहीं होगी। हुआ क्या?

राज्यों ने जब पैसा माँगा तो सरकार ने दिया आधे से भी कम। नतीजा मजदूरों को सूखा प्रभावित इलाकों में भी लंबे समय तक मजदूरी नहीं मिली। मजदूर अब इस योजना से भागने लगा है। बजट में यह तो नहीं बताया था। मजदूरों और गाँवों में काम करने वाले कहते हैं कि यूपीए-2 और एनडीए दोनों इस योजना को मारना चाहते हैं।

बजट की हकीकत पता लगती हैं आठ-दस महीने बाद। उसके पहले बजट में जो प्रावधान करते हैं, उसे खर्चते नहीं हैं। नए-नए बहानों तरीकों से पैसे जनता से निकालते रहते हैं। आम लोग अब समझते हैं कि बजट में सरकारें बात बढ़ा-चढ़ा कर पेश करती हैं। लेकिन असलियत और कुछ होती है।
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