हिमाचल प्रदेश में कुछ फीसदी वोट ही राजनीतिक दलों का सियासी भाग्य तय करते हैं। प्रदेश में अब तक सत्ता हासिल करने वाली पार्टी विरोधी दल से महज चार-पांच फीसदी वोट ज्यादा पाकर कुर्सी संभालती रही है। वर्ष 1998 का विधानसभा चुनाव इसका बड़ा उदाहरण है। उस समय कांग्रेस वोट प्रतिशत में भाजपा से आगे थी। कांग्रेस को 43.51 प्रतिशत और भाजपा को 39.02 प्रतिशत वोट मिले थे। दोनों दलों ने 31-31 सीटें जीती थीं।
कांग्रेस से अलग हुए पंडित सुखराम की हिमाचल विकास कांग्रेस (हिविकां) ने पांच सीटों पर जीत हासिल की थी। एक निर्दलीय रमेश धवाला जीते थे। शुरू में तो वीरभद्र सिंह के नेतृत्व में सबसे बड़े दल के हिसाब से कांग्रेस की सरकार बन गई। बाद में पंडित सुखराम की ओर से भाजपा को समर्थन दिए जाने से यह सरकार गिर गई। नई सरकार भाजपा और हिविकां के गठजोड़ से बनी। हिविकां को उस वक्त 9.63 प्रतिशत वोट मिले थे। कांग्रेस के वोट भाजपा से 4.49 प्रतिशत अधिक थे। चूंकि हिविकां पंडित सुखराम सहित कांग्रेस के अधिकतर नेताओं से टूटकर ही अलग दल बना था, तो माना गया कि इसके प्रत्याशियों को अधिकतर वोट कांग्रेस का ही मिला।
2003 में भाजपा से 5.62 फीसदी ज्यादा वोट लेकर कांग्रेस ने सरकार बनाई थी। कांग्रेस ने 41 और भाजपा ने 35.38 प्रतिशत वोट हासिल किए थे। हिविकां 5.87 प्रतिशत वोट लेकर एक ही सीट पर विजयी हुई थी। 12.60 प्रतिशत वोट पाकर निर्दलीय उम्मीदवार छह सीटों पर विजयी हुए थे। एक सीट पर महेंद्र सिंह लोक मोर्चा से जीते। एक सीट पर नाहन से लोजपा से सदानंद चौहान ने जीत हासिल की थी।
2007 में कांग्रेस से 4.24 प्रतिशत अधिक मत लेकर भाजपा ने 41 सीटों पर जीत हासिल की थी और कांग्रेस 23 सीटें जीत पाई थी। बसपा ने एक सीट कब्जाई थी। निर्दलीय उम्मीदवार तीन ही सीटों पर विजयी हुए थे। तब भाजपा सत्ता में पहुंची थी।