उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह की शर्तों से भाजपा के मिशन 2014 में फतह को झटका लग सकता है। दरअसल, फिर से कमल खिलाने के लिए बाबू जी ने कई शर्तें भाजपा हाईकमान के सामने पेश कर दी हैं। इन शर्तों को भाजपा कहां तक पूरा कर पाएगी इस पर ही मिलन की नींव टिकी है। वापसी में एक बड़ा पेंच भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी पर एकाएक लगे भ्रष्टाचार के आरोप के बाद भाजपा में आए तूफान ने भी फंसा दिया है।
दिल्ली की गद्दी को हासिल करने के लिए भाजपा ने अपने तरकश में हर तीर संजोया है। पूर्व सीएम कल्याण सिंह की भाजपा में वापसी भी ऐसा ही एक तीर है। भाजपा का मानना है कि अगर महंगाई बम यूपीए को घायल करेगा तो यूपी के कई जातियों को साथ ले लिए तो उनकी केंद्र में बैठने के लिए सबसे बड़ी पार्टी होने के लायक सीट मिल जाएगी। सहयोगी दलों के साथ वह सत्ता हासिल कर लेंगे।
कल्याण सिंह और भाजपा फिलहाल दोनों एक दूसरे की जरूरत महसूस कर रहे हैं, लेकिन बाबू जी का कुछ शर्त भाजपा से मनवाने के बाद ही एंट्री करने का शिगूफा छोड़ने से भाजपा में हलचल है। भाजपा सूत्रों के मुताबिक, बुलंदशहर लोकसभा सीट बाबूजी छोड़ने को तैयार नहीं हैं। इसके अलावा लोध जाति बाहुल्य अलीगढ़ आदि पांच लोकसभा सीट उनकी पसंद है। अपनी पार्टी के कई कद्दावर (वफादार) नेताओं को भाजपा में बेहतर ओहदा भी वह दिलाना चाहते हैं।
इतना ही नहीं, वह अपने वफादारों को विधानसभा चुनावों में अभी से टिकट की गारंटी और खुद भी कम से कम राष्ट्रीय उपाध्यक्ष से कम का पद नहीं चाहते। हालांकि कल्याण सिंह समर्थक और भाजपाई इस मुद्दे पर राष्ट्रीय स्तर का मामला बताकर मुंह खोलने को तैयार नहीं है। उनका इतना संकेत है कि कल्याण सिंह की वापसी में देरी जरूर हो सकती है, लेकिन वापसी पक्की है।