मजहब के नाम पर लड़ने वालों के लिए सहारनपुर के सलीम शाह एक मिसाल हैं। पांच वक्त की नमाज पढ़ने वाला यह शख्स इन दिनों उपवास पर है। दरअसल, वे कुछ दिनों बाद होनी वाली रामलीला की तैयारी में जुटे हैं।
बातचीत में बड़ी सादगी से कहते हैं दिल में राम और रहीम दोनों हैं। जाति और धर्म के नाम पर बांटने वाले तो सियासी हैं।
उनके बारे में कोई कुछ सोचे या कुछ भी कहे, लेकिन वह न तो अपना कर्म छोड़ेंगे और न ही इंसानियत के लिए जिंदगी जीने का मकसद। कई वर्षों की तरह इस बार भी सलीम सारी चिंताएं छोड़ रामलीला में कई पात्रों के मंचन की तैयारी में जुटे हैं।
शहर की पातालनगरी निवासी रामलीला कलाकार सलीम कहते हैं कि मजहबी तौर पर उनकी चाहे जो पहचान हो, लेकिन सच तो यह है कि राम की लीलाएं उसके दिल में बसती हैं और रामलीला के लिए उन्होंने जीवन समर्पित कर दिया है। यहीं से पहचान मिली है, प्यार मिला है और जीने का मकसद भी।
उनका कहना है कि वह जितनी शिद्दत से मस्जिद में नमाज पढ़ते हैं। उतनी ही शिद्दत से मंच पर राम की लीलाओं का मंचन भी करते हैं। मजहब के नाम पर बांटने वाले इस बारे में कुछ भी सोचते रहें उन्हें फर्क नहीं पड़ता।
सलीम ने बताया कि जब वे सात साल के थे तो सभी हिंदू-मुस्लिम बच्चे मिलकर एक चारपाई खड़ी करके रामलीला का मंचन करते थे। कोई राम बनता था। कोई रावण। कोई हनुमान तो कोई सुग्रीव। बस यहीं से शुरू हुई अभिनय की पाठशाला।
भरत, सुग्रीव आदि के रूपों में जानते हैं
शहर में लोग उन्हें सलीम से ज्यादा भरत, हनुमान, सुग्रीव और ताड़का के रूप में पहचानते हैं। वह रामलीला के मंच पर कई पात्रों का अभिनय कर चुके हैं। इनमें अहिरावण और बाणासुर के पात्र भी शामिल हैं।
‘रोटी मंदिर, रोटी मस्जिद...गुरुद्वारा’
मौजूदा दौर में हिंसा और तनाव के बीच सलीम अपनी कुछ पंक्तियों में संदेश देते हैं कि भूखे को रोटी देना और रोटी के लिए ईमानदारी से कर्म करना ही सबसे बड़ा धर्म है। वह कहते हैं, रोटी मंदिर, रोटी मस्जिद, रोटी ही गुरुद्वारा। सबसे बढ़कर है जगत में आपस का भाईचारा।