एक तरफ जहां पूरी दुनिया फुटबॉल विश्व कप के खुमार में डूबी है, वहीं भारत में फुटबॉल के नायक आजीविका के लिए रोड पर खड़े हैं।
भारत में अंतरराष्ट्रीय फुटबॉल खिलाड़ियों के हालात बदतर है।
हालत यह है कि भारत की महिला फुटबॉल टीम की सदस्य 23 वर्षीय रश्मिता पात्रा को परिवार के जीवन निर्वाह में मदद करने के लिए पान की दुकान चलाने पर मजबूर होना पड़ा है।
2011 में ढाका में जीता था टूर्नामेंट
केंद्रापाड़ा जिले के उल ब्लॉक में रहने वाली रश्मिता ने 2008 में कुआलालंपुर में खेले गए एएफसी अंडर-19 क्वालीफाइंग टूर्नामेंट में बतौर डिफेंडर भारत का प्रतिनिधित्व किया था।
2011 में ढाका में उन्होंने सीनियर एएफसी क्वालीफिकेशन राउंड में भारतीय टीम की ओर से हिस्सा लिया। इसी साल बहरीन के खिलाफ वह महिला सीनियर टीम में भी खेलीं।
भारत ने यह सीरीज 2-1 से जीती थी। इसके बाद उनकी फॉर्म में गिरावट आई और वह टीम से बाहर हो गईं।
नौकरी नहीं मिली तो खोल ली पान की दुकान
रश्मिता ने 12 साल की उम्र में अपने मेंटोर और कोच चिट्टा रंजन पात्रा की देखरेख में फुटबॉल खेलने की शुरुआत की थी।
पिछले साल शादी करने वाली रश्मिता ने कहा, ‘फुटबॉल ने मुझे नाम, शोहरत और पहचान दी लेकिन इसने मुझे अच्छी जिंदगी जीने का अवसर नहीं दिया। टीम से बाहर होने के बाद मैंने दोबारा नौकरी ढूंढने की कोशिश की लेकिन मुझे नौकरी नहीं मिली। मेरे पति एक मछुआरे हैं और उनकी कमाई बहुत ज्यादा नहीं है इसलिए परिवार की आय बढ़ाने के लिए मुझे पान की दुकान खोलनी पड़ी।’
फुटबॉल में बचपन बलिदान हुआ पर मिला कुछ नहीं
2010 में फुटबॉल चैंपियनशिप जीतने वाली ओडिशा टीम का रश्मिता पात्रा ने किया था प्रतिनिधित्व वर्ष 2011 में बहरीन के खिलाफ 2-1 से सीरीज जीतने वाली भारतीय टीम की सदस्य थीं।
रश्मिता के अनुसार, 'मैंने इस खेल के लिए अपने बचपन का बलिदान दिया और इस कारण मैं पढ़ाई भी बहुत कम कर सकी। मगर अब जबकि खुद को इस हाल में पाती हूं तो खेल के वो सुनहरे दिन काफी तकलीफ पहुंचाते हैं।'