बांबे हाईकोर्ट ने कहा है कि यदि किसी व्यक्ति ने अपने भावी नियोक्ता से किसी आपराधिक मामले में दोषी साबित होने से संबंधित जानकारी छिपाई है तो वह उस नौकरी को पाने के लिए दावा नहीं कर सकता है।
यह भी मायने नहीं रखता कि कोर्ट ने उसे बाद में माफ कर दिया है या कि अच्छे आचरण के बांड पर उसे छोड़ दिया है।
अमरावती के रहने वाले अमित मोहोद ने याचिका दाखिल कर बैंक ऑफ इंडिया के उस फैसले को चुनौती दी थी, जिसमें उसके चोरी के एक मामले में फंसने के बावजूद बैंक को जानकारी न देने पर लिपिक पद के लिए उसका चयन रद्द कर दिया था।
बैंक ऑफ इंडिया ने ऐसा बैंकिंग रेग्युलेशन एक्ट के नियमों के तहत किया था। जस्टिस बीपी धर्माधिकारी व पीवी वरले की पीठ ने कहा कि जब तक नियोक्ता नियुक्ति आदेश जारी नहीं करता, तब तक उसके पास काफी अधिकार होते हैं व वह किसी भी व्यक्ति को सेवा में आने से रोक सकता है। नियोक्ता बैंक ने ऐसा करके न तो मनमाना आचरण कर रहा है और न ही गलत।