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मोबाइल और सोशल मीडिया से हुआ है एक बड़ा नुकसान

Sun, 30 Mar 2014 11:45 PM IST
धीरज कनोजिया/अमर उजाला, नई दिल्ली
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10-15 साल पहले जैसे चुनाव होते थे, उसके मुकाबले अब नजारा बिल्कुल बदल गया है। टेलीविजन, मोबाइल और इंटरनेट के आने के बाद चुनाव भले ही हाईटेक और आधुनिक हो गया है। पार्टियों के चुनाव प्रचार के तरीके बदल गए हैं। मगर मोबाइल, टीवी और सोशल मीडिया के शोर में आम आदमी की आवाज और उसके आम मुद्दे दब से गए हैं।
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भले ही इस बात को महसूस न किया जा रहा हो मगर इन क्षेत्रों के जानकार इस बात को लगातार समझ रहे हैं। जानकारों का मानना है कि सोशल मीडिया के आने के बाद प्रमुख मुद्दों को लेकर आम आदमी की गंभीरता खत्म हो रही है।

टीवी चैनलों, ट्विटर और फेसबुक पर राजनीतिक दलों की ओर से एक-दूसरे की टांग खिंचाई देखने को मिलती है, जिससे लोग ऊब ज्यादा रहे हैं।

राजनेताओं की ‘तू तू मैं मैं’ में दिलचस्पी नहीं

प्राइम टाइम यानी रात आठ से 11 बजे तक ज्यादातर न्यूज चैनलों में नेताओं के बीच विभिन्न मुद्दे पर पैनल चर्चा दिखाई जाती है। टीआरपी के मुताबिक देखा जाए तो इस समय ज्यादातर लोग मनोरंजन चैनल ही देखते हैं। बहुत कम लोग ही इस समय न्यूज चैनलों को देखते हैं।राजनेताओं की ‘तू तू मैं मैं’ को देखने में किसी की दिलचस्पी नहीं है।

इसी तरह ट्विटर और फेसबुक में एक दूसरे पर फब्ती और आलोचनाओं को लेकर भी दिलचस्पी घटती दिख रही है। आईटी विशेषज्ञ पवन दुग्गल कहते हैं कि सोशल मीडिया में राजनीतिक चर्चा कम कीचड़ ज्यादा उछाला जा रहा है। राजनीतिक दल भी चाह रहे हैं कि अहम मुद्दों पर चर्चा न हो।

जानकार मानते हैं कि सोशल मीडिया में लोगों का ध्यान बहुत कम केंद्रित होता और बहुत जल्दी हट भी जाता है। छोटी-छोटी चीजों का राई का पहाड़ बनाया जाता है।
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देश में सोशल मीडिया अभी प्रभावी नहीं

वहीं अन्य आईटी जानकारी सुधीर उपाध्याय कहते हैं कि अभी देश में ऐसी स्थिति नहीं आई है कि यहां सोशल मीडिया की वजह से चुनाव जीता और हार जाए। यहां अभी इसका पहला चरण है। अभी राजनीतिक परिपक्वता आना जरूरी है। साथ ही इस दिशा में कई कदम उठाए जाने भी जरूरी हैं।

दुग्गल कहते हैं कि चुनावों के संबंध में सोशल मीडिया को कैसे नियंत्रित करना है। न राजनीतिक दलों को पता है और न ही चुनाव आयोग को पता है। आयोग ने कुछ दिशा निर्देश तो जारी किए है।

मगर ये दिशा निर्देश किस कानून के अधीन होंगे और इसका कैसे पालन होगा। इसे लेकर बताया नहीं गया है क्योंकि सोशल मीडिया के कई सेवा प्रदाता यानी सर्विस प्रोवाइडर देश के बाहर हैं और वे देश का कानून नहीं मानते। इन सब बातों को लेकर आयोग और सरकार दोनों को ध्यान देना होगा।
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