राजनीतिक पार्टियों और उम्मीदवारों को अब अपने चुनाव प्रचार में सोशल मीडिया के उपयोग पर किए जाने वाले एक-एक पैसे का हिसाब रखना होगा। यह फरमान चुनाव आयोग की ओर से जारी किया गया है।
चुनाव आयोग ने शुक्रवार को राजनीतिक दलों और उम्मीदवारों के ट्विटर, फेसबुक और यूट्यूब जैसे सोशल साइट्स पर प्रचार के लिए किए जा रहे खर्चों को नियंत्रित करने के लिए विस्तृत ब्योरा बनाया है। आयोग ने पार्टियों और उम्मीदवारों से उपयोग किए जा रहे सोशल मीडिया अकाउंट्स की जानकारी मांगी है, जिस पर वह चुनाव प्रचार के लिए सामग्री डाल रहे हैं।
जारी निर्देश के अनुसार राजनीतिक दलों को इंटरनेट कंपनियों और सोशल मीडिया वेबसाइट्स पर किए गए प्रचार के बदले दिए गए पैसे का ब्योरा देने को कहा गया है। साथ ही इसको चलाने के लिए रखे लोगों की सेलरी भी बताने को कहा गया है। इन सबके अलावा चुनाव आयोग ने पार्टियों और उम्मीदवारों द्वारा डाले गए कंटेट को भी आचार संहिता के दायरे में रखा है।
सोशल मीडिया के बढ़ते उपयोग पर गौर करते हुए चुनाव आयोग ने राजनीतिक प्रचार को मुख्य रूप से 5 अलग-अलग भागों में बांट दिया है।
1. विस्तृत प्रोजेक्ट (विकिपीडिया)
2. ब्लॉग और माइक्रो ब्लॉग (ट्विटर)
3. कटेंट कम्युनिटी (यूट्यूब)
4. सोशल नेटवर्किग साइट (फेसबुक)
5. वर्चुअल गेम वर्ल्ड (एप्स)
सोशल मीडिया में प्रचारित चुनावी प्रचार से संबंधित इसके कानूनी पहलुओं को लेकर चुनाव आयोग ने साफ कहा कि यह ठीक उसी तरीके से काम करेगा जैसे किसी अन्य मीडिया में चुनाव प्रचार के दौरान होता है।
इसी गाइडलाइन के अनुसार उम्मीदवारों को अपने नामांकन पत्र दाखिल करने के दौरान ही अब अपने प्रमाणिक सोशल मीडिया अकाउंट की जानकारी देनी होगी।
इंटरनेट और सोशल मीडिया वेबसाइट्स पर जारी होने वाले राजनीतिक विज्ञापन के लिए पार्टियों को राज्य और जिला स्तर के मीडिया सर्टिफिकेशन और मॉनिटरिंग कमेटियों से मंजूरी लेनी होगी। ऐसी ही मंजूरी पार्टियों को इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में प्रचार करने से पहले लेनी पड़ती रही है।
चुनाव आयोग ने अपने निर्देश में कहा है कि इंटरनेट मीडिया और वेबसाइट्स पर वही विज्ञापन जारी हों जो पहले सर्टिफाई किए जा चुके हों।