राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुडे महिला संगठन दुर्गावाहिनी को किस तरह के संगठन की श्रेणी में रखा जाना चाहिए। दुर्गावाहिनी भारत की महिलाओं को कैसे प्रशिक्षित करती है और उसके लक्ष्य क्या हैं।
इन्हीं सवालों को लेकर 2012 में डॉक्यूमेंट्री फिल्ममेकर निशा पाहुजा ने एक फिल्म बनाई। जिसे बैस्ट कनेडियन फीचर का अवार्ड मिला।
निशा पाहुजा को तब दुर्गावाहिनी के कैंप में जाकर शूटिंग करने का मौका मिला था और वह वहां प्रशिक्षण ले रही लड़कियों से मिली थीं। संघ में क्या है दुर्गावाहिनी की भूमिका? पढें ये खास रिपोर्ट।
दस दिन के दुर्गावाहिनी शिविर का यह आखिरी दिन है और महाराष्ट्र के शहर औरंगाबाद की गलियों में 80 लडकियां कदमताल करते हुए गा रही हैं और गर्व के साथ भारत के हिंदू राष्ट्र होने का ढिंढोरा पीट रही हैं।
दुर्गावाहिनी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की धार्मिक मामलों की शाखा विश्व हिंदू परिषद (विहिप) का महिला सांस्कृतिक संगठन है।
दुर्गावाहिनी की परेड
पूरे देश में दुर्गावाहिनी की तरफ से ऐसी परेड होती रहती हैं।
बस में मौजूद लड़कियों के बीच माहौल दोस्ताना है, मगर उत्तेजना भी है। लड़कियां सफेद सलवार कमीज और केसरिया रंग के दुपट्टे में हैं।
शिविर की दो मार्गदर्शक बस में आगे बैठी हैं और लड़कियों का नेतृत्व करते हुए गा रही हैं, "हिंदुस्तान हिंदुओं के लिए, पाकिस्तान जाए भाड़ में!"
फिर वो मुस्कराते हुए कहती हैं, "इसकी वजह से किसी को जेल भेजा जा सकता है!" तभी एक युवा लड़की कहती है, "हम अपने विश्वास के लिए मर-मिटने को तैयार हैं।" दूसरी ने कहा, "जो हमारे रास्ते में आएगा, हम उसे मार डालेंगे।"
हिंदुत्व का प्रचार
13 से 25 साल की ये लडकियां 10 दिन पहले तक शर्मीली, सरल और मृदुभाषी थीं।
इनमें से अधिकतर पहली बार (और शायद आखिरी बार) अपने घर परिवार से दूर अकेली हैं। ज्यादातर ग्रामीण पृष्ठभूमि से हैं, कम पढी-लिखी हैं, नीची जाति से हैं और अगले कुछ साल में उनकी शादी हो जाएगी।
शिविर में आने से पहले ही इनमें से कई मुसलमानों और ईसाइयों के खिलाफ किसी धारणा से मुक्त थीं, जो विहिप और आरएसएस की विचारधारा है। मगर इन 10 दिनों में बहुत कुछ बदला है।
सेना की तरह प्रशिक्षण के अलावा इन लडकियों को संशोधित इतिहास की घुट्टी भी पिलाई जाती है जिसमें हिंदू प्रभुत्व को बढा-चढाकर बताया जाता है कि हिंदुत्व ही भारत का एकमात्र वैध धर्म है।
उन्हें बताया जाता है कि हिंदुत्व की रक्षा और प्रचार ही देशसेवा है।
स्वतंत्रता और सम्मान
योद्धा के साथ-साथ एक पत्नी भी- ये लड़कियां इतनी मजबूत होनी चाहिए कि वह दुश्मन की हड्डियां तोड़ सकें, लेकिन इतनी सीधी-सादी भी कि अपने पति से कभी सवाल न करें।
दुर्गावाहिनी का नेतृत्व इस दोहरेपन से आंखें मूंदे हुए है- मगर साफ है कि इसका असर यही होना है।
इस द्वंद्व को अगर किसी में एकदम साफ ढंग से देखा जा सकता है तो वह हैं शिविर की मार्गदर्शक प्राची त्रिवेदी। मैं अब तक इतनी ऊर्जावान महिला से नहीं मिली थी।
बेहद सीमित विकल्पों के बीच दुर्गा वाहिनी के लिए काम करने (जिसे वह जटिल मानती हैं) से उन्हें सम्मान और स्वतंत्रता मिली है।
प्राची ही हैं, जिनकी वजह से मैं वहां थी और मुझे इस शिविर में आने की इजाजत मिली। इस दुनिया तक पहुंचने में मुझे करीब दो साल लगे और सिर्फ हमारी कैमरा टीम को ही शिविर में प्रवेश की इजाजत मिली।
मैं दुर्गावाहिनी सदस्यों समेत बजरंग दल और विहिप के कुछ युवा नेताओं से अपनी शुरुआती मुलाकातें कभी नहीं भूल सकती, जिनके बारे में बाद में मुझे पता चला कि उनमें से कई किसी हिंसक घटना में शामिल रहे हैं।
शिविर तक पहुंच
विहिप के लोक कल्याणकारी चेहरे से मेरा परिचय कराने के लिए उन्होंने पहले मुझे यौनकर्मियों और उनके बच्चों के लिए चलाए जा रही एक पुनर्वास परियोजना के बारे में बताया।
शिविर में पहुंचना आसान न था- इसमें धैर्य, बातचीत, ईमानदारी, भाग्य और काफी समय बिताना पडा़। लेकिन इन सबसे बडी बात प्राची, उनके परिवार और प्रमुख विहिप नेताओं का विश्वास हासिल करना था, जिसकी वजह से शिविर में पहुंचना संभव हो पाया।
आखिर, करीब दो साल के बाद उन्होंने उस दुनिया के दरवाजे खोले, जो पेचीदा, चौंकानेवाली और जटिल थी- पर इसने मुझे उनके बारे में मेरी अब तक की सोच और अनुमानों पर सवाल खडे करने को मजबूर किया।
हां, वहां काफी चिंताजनक हालात थे- युवा लडकियों को उन्मादी बनाकर 'दूसरे' से घृणा करना सिखाना खुद में ही हिंसा है। फिर भी इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि ये युवतियां 10 दिन में ज्यादा मजबूत और आत्मविश्वासी बन गई थीं।
भारत जैसे देश में जहां महिला अधिकार एक लगातार चलने वाली लडा़ई है, वहां इनका रूपांतरण एक अनोखी बात है, यह जानते हुए भी कि इसकी कीमत असहिष्णुता है।
इससे भी इनकार नहीं किया जा सकता कि ये पाठ पढने वाले लोग खूब मेहमाननवाज हैं और देशसेवा की इच्छा रखते हैं।
इन्हें जो चीज प्रेरित करती है, वह है एक दृष्टि, सच का ख्याल और नैतिकता जिसे उन्होंने हासिल किया है। उनके लिए यह उतना ही मजबूत है, जितना मेरा समानता में या यह यकीन कि 'लोकतंत्र' ही आगे बढने का एकमात्र रास्ता है।
आस्था का सवाल
ये मेरे लिए यह आस्था का सवाल बन गया। कोई कैसे आस्था के लिए तर्क खोज सकता है? और वह भी ऐसी आस्था जो परिवार और सामाजिक ढांचा आपमें जबरन पैदा करता है। अंतत: जो आपकी उस दुनिया का हिस्सा बनते हैं, जिसमें आप जीते हैं।
मेरे ख्याल से हम सभी समय, स्थान, इतिहास, जींस और अनगिनत ऐसी वजहों की देन हैं जो हमारे नियंत्रण से बाहर हैं। अगर यही हमारी सामूहिक पूंजी है, तो हमारी कितनी पसंद सही मायने में हमारी अपनी हैं? हममें से कितने वास्तव में आजाद हैं?
शिविर के अंतिम दिन, जब लड़कियों का एक गुट घर जाने को वैन में बैठ रहा था, तो एक वरिष्ठ लड़की पंसारे ने हाथ जोडते हुए कहा, "माफ कीजिएगा अगर हमसे कोई गलती हुई हो।"
यह अभी भी मेरे लिए फिल्म के कुछ सबसे मर्मस्पर्शी संवादों में से एक है।
यह मुझे याद दिलाता है कि हम सब महाकाव्य हैं, जिन्हें अक्सर ऐसी ताकतें नियंत्रित करती हैं, जो हमें नजर नहीं आतीं।