पानी की बूंद-बूंद को तरसते सूखाग्रस्त बुंदेलखंड के एक गांव को ननद-भाभी की जोड़ी ने खुशियों से तर कर दिया है। इनके अथक प्रयास का ही नतीजा है कि आज यह गांव कुपोषण मुक्त हो चुका है।
आंगनबाड़ी कार्यकर्ता विमला और उसकी ननद कल्पना ने ललितपुर के राजघाट गांव को ढाई वर्ष के अंदर कुपोषण मुक्त बना दिया है। अब यहां कोई भी बच्चा कुपोषण का शिकार होकर नहीं मरता।
इनकी बदौलत यहां के प्रत्येक परिवार को बच्चों के लालन-पालन, पोषण की पूरी जानकारी हो चुकी है। यह दोनों स्वास्थ्य देखभाल और उनसे जुड़ी जानकारियों को बड़ी सरलता से घर-घर पहुंचाने का काम कर रही हैं।
इसी वजह से रूढ़िवादी परंपराएं और कुप्रथाएं भी धीरे-धीरे दम तोड़ रही हैं।
भाभी और ननद की यह जोड़ी पहली बार रेल से सफर कर दिल्ली आई है। वे बताती हैं कि उनके प्रयासों के बदौलत राजघाट गांव में अब कोई भी बच्चा कुपोषण का शिकार नहीं है।
असामाजिक तत्वों ने रोका रास्ता
विमला और कल्पना को गांव के असामाजिक तत्वों ने रोकने की कोशिश की। बड़े-बुजुर्गों का ताने भी सुनने पड़े। लेकिन अब गांव में हालात बदल चुके हैं।
भयावह है स्थिति
यूनिसेफ के मुताबिक देश में 15 लाख बच्चे अपना पांचवां जन्मदिन मनाने से पहले मौत के आगोश में सो जाते हैं। इस मामले में यूपी अव्वल है, जहां 42% बच्चों की मौत कुपोषण के चलते हो जाती है।
उत्तर प्रदेश में केवल 51% बच्चों को ही माताएं 6 महीने तक स्तनपान करा पाती हैं। जबकि दो साल तक स्तनपान की अनिवार्यता पर जोर दिया जाता है।
2005-06 के आंकड़ों के मुताबिक भारत में 48% बच्चे पोषण की कमी से अविकसित हुए।