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एस.जयशंकर ने संभाला विदेश सचिव का पद

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बुधवार को देर रात विदेश सचिव बनाए गए एस जयशंकर ने बृहस्पतिवार को कार्यभार संभाल लिया। इस दौरान कार्यकाल में की गई कटौती से नाराज निवर्तमान विदेश सचिव ने अनुपस्थित रह कर अपनी नाराजगी का इजहार कर दिया।
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पद संभालने के बाद विदेश सचिव ने सरकार की प्राथमिकताओं को अपनी प्राथमिकता बताया और अपनी नई भूमिका को सम्मान के साथ बड़ी जिम्मेदारी करार दिया।

उल्लेखनीय है कि कैबिनेट की नियुक्ति मामलों की कमेटी ने बुधवार देर रात सुजाता के कार्यकाल में कटौती कर अचानक अमेरिका में भारत के राजदूत की जिम्मेदारी संभाल रहे जयशंकर को नया विदेश सचिव नियुक्त कर दिया। वर्ष 2013 में विदेश सचिव बनाई गई सुजाता के कार्यकाल के करीब 8 महीने बाकी थे।

बतौर राजदूत 31 जनवरी को रिटायर हो रहे जयशंकर को विदेश सचिव बनाए जाने के बाद उनका कार्यकाल दो साल बढ़ जाएगा। वर्ष 1977 बैच के आईएफएस अधिकारी जयशंकर वर्ष 2013 में भी सुजाता के साथ इस पद की रेस में शामिल थे।
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सुजाता सिंह नहीं थी मौजूद

बृहस्पतिवार को जब जयशंकर अपनी नई जिम्मेदारी संभाल रहे थे तब निवर्तमान विदेश सचिव इस दौरान वहां उपस्थित नहीं थी। हालांकि प्रभार देने के लिए निवर्तमान विदेश सचिव की उस दौरान वहां उपस्थिति कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं है।

मगर शिष्टाचार के तहत निवर्तमान विदेश सचिव ऐसे मौकों पर उपस्थित रहते आए हैं। मंत्रालय के सूत्रों के मुताबिक हालांकि सरकार ने उन्हें सम्मानजनक पद देने का भरोसा दिया है, मगर सुजाता सरकार के इस फैसले से बेहद नाराज हैं। इस दौरान जयशंकर ने भी कार्यभार संभालने के बाद संक्षिप्त टिप्प्णी ही की।

कूटनीतिक मोर्चे पर कई अहम जिम्मेदारी निभा चुके जयशंकर शुरू से ही इस पद के लिए पीएम मोदी की पहली पसंद थे। भारत-अमेरिका असैन्य परमाणु करार और अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा की भारत यात्रा कराने में उनकी भूमिका बेहद अहम थी।

मनमोहन की पसंद पर मोदी का दांव

एस जयशंकर वर्ष 2013 में भी विदेश सचिव के पद की  रेस में सबसे आगे थे। तब वह तत्कालीन पीएम मनमोहन सिंह की पहली पसंद थे। लंबी रस्साकशी के बाद मनमोहन को कांग्रेस नेतृत्व की पसंद सुजाता सिंह के नाम पर सहमति देनी पड़ी थी।

लेकिन पीएम बनने के बाद नरेंद्र मोदी जयशंकर के चीन, श्रीलंका, रूस और अमेरिका में गहरे संपर्कों का लाभ उठाना चाहते थे। इसलिए उन्हें मई महीने में पीएमओ से सीधे जुड़े विदेश नीति पैनल का गठन कर इसकी जिम्मेदारी लेने का आग्रह किया था।

जयशंकर के इस आशय का प्रस्ताव ठुकराने के बाद बीते साल जुलाई महीने में उन्हें विदेश सचिव बनाने का फैसला कर लिया गया था। हालांकि इस बीच बीते साल ब्रिक्स सम्मेलन में बेहतर तैयारी न होने पर पीएम सुजाता से बेहद नाराज हो गए। इसके बाद से ही उनकी उल्टी गिनती शुरू हो गई थी।

'हटाई नहीं गई सरकार से खुद मांगी थी सेवानिवृत्ति'

पूर्व विदेश सचिव सुजाता सिंह ने कहा है कि उन्हें विदेश सचिव पद से हटाया नहीं गया, बल्कि उन्होंने खुद सरकार से जल्द सेवानिवृत्ति का अनुरोध किया था। इस मामले में विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने भी ट्विट कर एस जयशंकर को विदेश सचिव बनाए जाने संबंधी जानकारी पहले ही सुजाता को दिए जाने की बात कही है।

उन्होंने कहा है कि जयशंकर को विदेश सचिव बनाने के निर्णय में उनकी पूरी भागीदारी थी। उन्होंने इस मसले पर सुजाता से व्यक्तिगत रूप से भी बात की थी। उल्लेखनीय है कि बुधवार देर रात कैबिनेट की नियुक्ति संबंधी कमेटी ने सुजाता की जगह जयशंकर को विदेश सचिव नियुक्त कर दिया था। सरकार के इस फैसले पर कांग्रेस ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए सरकार से स्पष्टीकरण मांगा था।

विदेश सचिव पद से हटाए जाने केबाद के सुजाता सिंह ने कहा है कि उन्हें हटाया नहीं गया, बल्कि उन्होंने खुद सरकार से जल्द सेवानिवृत्ति का अनुरोध किया था। इस फैसले के दिन ही अपने सहयोगियों को भेजे ईमेल में उन्होंने कहा है कि विदेश सचिव के रूप में इस पद पर बैठा व्यक्ति राजनीतिक नेतृत्व और भारत के विदेश नीतियों या हितों से जुड़े मुद्दे में अहम कड़ी बनता है।

अपने फेयरवेल संदेश में उन्होंने लिखा है कि कोई व्यक्ति संस्थान या देश के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है लेकिन मेरा मानना है कि कोई भी व्यक्ति संस्थान या देश से बड़ा नहीं हो सकता। यहां कभी भी व्यक्ति विशेष की बात नहीं हो सकती। यहां हमेशा देश की बात होगी। और कैसे संस्थान और व्यक्ति एक दूसरे के साथ समन्वय रखते हैं। उधर सुषमा ने भी ट्विट के माध्यम से जयशंकर की नियुक्ति संबंधी निर्णय से अलग रखने और सुजाता के नाराज होने का खंडन किया है।
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कांग्रेस की ओर से उठे सवाल

विदेश सचिव पद से सुजाता सिंह को हटाने को लेकर कांग्रेस की ओर से सवाल उठाया गया है। कांग्रेस नेता मनीष तिवारी ने सरकार से पूछा है कि क्या आईएफएस अधिकारी देवयानी खोबरागड़े के मामले में अमेरिका के खिलाफ कड़ा रूख अपनाने वाली सुजाता सिंह को इसकी कीमत चुकानी पड़ी है।

मनीष तिवारी ने कहा है कि विदेश सचिव को हटाना कहीं देवयानी खोबरागड़े पर उनके रुख का प्रतिशोध तो नहीं है। उन्होंने ट्विटर पर कहा है, ओबामा के दौरे के बाद उनको हटाया जाना क्या इत्तेफाक है। गौरतलब है कि अमेरिका में खोबरागड़े की गिरफ्तारी से राजनयिक विवाद उत्पन्न हो गया था और उस वक्त सुजाता सिंह विदेश सचिव थीं।

वीजा धोखाधड़ी के आरोपों में 1999 बैच की आईएफएस अधिकारी को 2013 में न्यूयॉर्क में गिरफ्तार किया गया था। इस मामले से दोनों देशों के बीच टकराव पैदा हो गया था। भारत ने अमेरिकी राजनयिकों को कई श्रेणियों में मिलने वाला दर्जा घटा दिया था। विदेश सचिव के तौर पर सुजाता ने इस मामले में अमेरिका के खिलाफ कड़े फैसले लिए थे।
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