बिहार के सियासतदानों ने जोड़तोड़ और गुणा-गणित की सियासत के पुराने पड़ चुके फार्मूलों को ताजा कर दिया।
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स्थिर सरकारों के दौर में बहुमत सिद्घ करने और विधायकों की खरीदफरोख्त के तौर-तरीकों पर धूल पड़ चुकी थी, लेकिन पिछले सप्ताह बिहार के राज्यपाल केशरीनाथ त्रिपाठी ने मुख्यमंत्री जीतनराम मांझी को बहुमत सिद्घ करने की तारीख जैसे ही मुकर्रर की उन तौर-तरीकों और फार्मूलों की किताब को बाहर निकाला गया और झाड़पोंछ कर फिर से पढ़ा जाने लगा।
बहरहाल जीतनराम मांझी के इस्तीफे के कारण जनता वह सियासी ड्रामा देखते-देखते रह गई। फिलहाल सवाल यह है कि लोकसभा चुनावों के बाद से मोदी विरोध की धूनी रमा रहे नीतीश कुमार बिहार में भाजपा की लहर को रोकने में कामयाब हो पाएंगे। क्या नीतीश भी बिहार के केजरीवाल साबित होंगे?
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केजरीवाल का फार्मूला नीतीश ने लिया हाथोंहाथ
आम आदमी पार्टी संयोजक अरविंद केजरीवाल ने भारतीय राजनीतिज्ञों को सफलता का नया फार्मूला दिया है-माफी का। केजरीवाल ने दिल्ली की नुक्कड़सभाओं में घूम-घूम कर मुख्यमंत्री पद छोड़ने के लिए माफी मांगी और चुनावों में रिकॉर्डतोड़ सीटें जीतने में कामयाब रहे।
नीतीश कुमार ने केजरीवाल का ये फार्मूला हाथोंहाथ लिया। इकॉनमिक टाइम्स को दिए इंटरव्यू में उन्होंने कहा कि जीतनराम मांझी को मुख्यमंत्री बनाना गलती थी, मैं इसके लिए सार्वजनिक रूप से माफी मांगने के लिए तैयार हूं।
उन्होंने कहा कि मांझी को बिहार पर थोपने के लिए जनता को मुझे जिम्मेदार मानना चाहिए। मुझे अपनी गलती के लिए माफी मांगने में बिलकुल शर्मिंदगी महसूस नहीं होगी। नीतीश ने कहा कि मुझे सीख मिल गई है, भविष्य में कभी भी मैं समय से पहले इस्तीफा नहीं दूंगा।
शुक्रवार को जीतनराम मांझी के इस्तीफे के बाद नीतीश एक बार फिर ये बात दोहराई और कहा कि मैं अपनी गलती स्वीकार करता हूं और बिहार की जनता से अपने किए कि क्षमा मांगने के लिए तैयार हूं।
नीतीश की ईमानदारी केजरीवाल जैसी ही है क्या?
नीतीश की माफी के बाद ऐसी बहस होने की पर्याप्त संभावना है कि क्या वह भी राजनीतिक रूप से उतने ही ईमानदार हैं, जितने कि केजरीवाल?
राजनीति में महज दो साल पुराने केजरीवाल की माफी को दिल्ली की जनता ने सिर आंखों पर लिया। नीतीश का चार दशकों का खांटी राजनीतिक जीवन है। केंद्र की राजनीति से लेकर प्रदेश तक उन्हें जोड़तोड़ और समझौतों का लंबा अनुभव है। अब ये देखना होगा कि क्या बिहार की जनता नीतीश की माफी को पलकों पर उठाएगी?
आज नीतीश को मलाल है कि उन्होंने मांझी को मुख्यमंत्री क्यों बना दिया? उन्होंने जब मांझी को मुख्यमंत्री बनाने का फैसला किया था, उस समय कहा गया कि नीतीश ने एक महादलित को उसका हक दिलाया है।
जदयू के नेताओं ने नीतीश के फैसले को सामाजिक कल्याण का क्रांतिकारी फैसला करार दिया। जानकारों ने कहा कि नीतीश ने महादलित को मुख्यमंत्री बनाकर महदालितों में अपना जनाधार मजबूत किया है।
नीतीश ने अब महादलित कार्ड से भी तौबा कर ली
नीतीश को महादलित का मसीहा होने का खिताब दिया गया और वो गौरवान्वित भी होते रहे। जबकि ये बहुत ही स्पष्ट है कि नीतीश ने लोकसभा चुनावों की हार के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विरोध और भाजपा से गठबंधन तोड़ने के फैसला अपने सिर पर लेते हुए इस्तीफा दिया था।
मांझी को मुख्यमंत्री बनाने के महादलित कार्ड सामने आया और उन्होंने उस कार्ड को भी वोटों की उगाही के लिए खेलते रहना मुनासिब समझा। उन्होंने कभी ये नहीं कहा कि मांझी को मुख्यमंत्री बनाना महादलित कार्ड नहीं था, बल्कि उन्होंने अपनी कैबिनेट के सबसे वरिष्ठ सदस्य को मुख्यमंत्री बनाया है।
जबकि शुक्रवार को उन्होंने महादलित कार्ड की सियासत को दरकिनार करते हुए कहा कि मांझी को मुख्यमंत्री उन्होंने वरिष्ठ होने के नाते बनाया था, लोगों ने उसे महादलित कार्ड समझ लिया।
नीतीश और केजरीवाल के इस्तीफे के मंतव्य में अंतर
केजरीवाल ने लोकसभा चुनाव से पहले इस्तीफा दिया था और नीतीश ने बाद में। राजनीतिक जानकारों की नजरों में पिछले लोकसभा चुनावों में दोनों ही प्रधानमंत्री पद के दावेदार थे। हालांकि दोनों के इस्तीफे का मंतव्य कतई एक जैसा नहीं था।
केजरीवाल जनलोकपाल बिल पास करने पर अड़े थे, हालांकि विधानसभा में समीकरण उनके पक्ष में नहीं थे। दिल्ली विधानसभा चुनावों में केजरीवाल की जीत का बहुत बड़ा आधार भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन से उपजी उनकी विश्वसनीयता थी।
जनलोकपाल बिल पर इस्तीफे के बाद उन्होंने भ्रष्टाचार विरोधी लड़ाई को अधिक मजबूत किया, हालांकि उनके इस्तीफे को मतलब यह निकाला गया कि वे प्रधानमंत्री की कुर्सी के लिए दिल्ली की मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़ कर भाग गए।
यह आरोप ही केजरीवाल पर भारी पड़ गया और लोकसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी औंधे मुंह गिर पड़ी।
केजरीवाल राजनीति में नए थे और विपक्षी दलों ने उन पर तगड़ा हमला किया। जिसके बाद उन्होंने बड़ी आसानी से अपनी छवि पीड़ित की बना ली। भाजपा ने केजरीवाल के खिलाफ जैसा प्रोपेगंडा किया, उसके बाद ये बात और पुख्ता हुई। नीतीश की छवि राजनीति में पीड़ित की कतई नहीं है।
उन्होंने कहा कि मांझी भाजपा के हाथ में खेलने लगे थे, इसलिए उन्हें हटाने का फैसला लिया गया। हालांकि इससे ऐसा संदेश कतई नहीं गया कि मांझी के जरिए भाजपा नीतीश का उत्पीड़न किया। मांझी के बयानों और फैसलों से जदयू के नेताओं को परेशानी हो रही थी।
नीतीश कुमार और शरद यादव जैसे नेताओं को ऐसा लग रहा था बेलगाम मांझी जदयू के जनाधार को नुकसान पहुंचा सकते हैं, इसलिए उन्होंने उन्हें हटाने का फैसला किया। जानकारों के मुताबिक ये फैसला राजनीतिक है और नैतिकता जैसी इसमें कोई बात नहीं। ऐसे में नीतीश की माफी राजनीतिक अधिक माना जा सकता है और नैतिक कम।
अब ये बिहार की जनता को तय करना है कि वह नीतीश की माफी को क्या मानती है-राजनीतिक या नैतिक। उसके बाद ही ये तय हो पाएगा कि नीतीश बिहार के केजरीवाल बन पाएंगे या नहीं।