कहा जा रहा है कि उनके प्रेम प्रसंग के फोटो सार्वजनिक नहीं होते तो अपने प्यार को दुनिया से छुपाए रहते। लेकिन यह भी कहा जा रहा है कि बस चुनाव की बेला निपटने की देर थी, वह खुल कर अपनी प्रेमिका से जीवन डोर बंधने की बात बताते। इस बात पर न भी जाएं तो अब इसमे छिपने छिपाने जैसा कुछ नहीं रहा। एक ट्वीट के जरिए कांग्रेस के नेता दिग्विजय सिंह ने खुल कर कह दिया, प्यार किया तो डरना क्या। उम्मीद यही कि जल्द ही वह और टीवी रिपोर्टर अमृता राय शादी के बंधन में बंध जाएंगे। दिग्विजय सिंह हमेशा चर्चाओं में रहते हैं मगर आज उनकी चर्चा कुछ दूसरे संदर्भ में है। वह कुछ कहें और उस पर टिप्पणी न हो, यह संभव नहीं। इसलिए उनके प्रेम प्रसंग पर भी खासी बातें हो रही है।
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उन्होंने प्यार किया तो भला ऐतराज किसे हो? दिग्विजय सिंह की पत्नी अब इस दुनिया में नहीं। वह जिस अमृता राव के प्यार में डूबे हैं वह अपने पति को तलाक देनेवाली है। चाहे वो किसी भी अवस्था में हों, किसी से प्यार करने और घर बसाने का उन्हें पूरा अधिकार है। अमृता से प्यार करके या नई दुनिया बसाकर वह कोई अपराध नहीं कर रहे। बल्कि अपनी बाकी उम्र को संजोने का एक जरिया तलाश रहे हैं। पर कहा जा रहा है कि दिग्विजय सिंह की जिस तरह के परिपक्व नेता की छवि रही है और उम्र के जिस पड़ाव में वह है उसमें प्यार रोमांस की कम गुजाइंश होती है। कई बार ऐसी खबरें उन समर्थकों को हैरान कर देती हैं, जो अपने नेता की कोई खास छवि बना देती है। कुछ नेताओं के तो रसिक मिजाज होने का सबको पता रहता है, कुछ नेताओं के प्यार मोहब्बत के नग्में उनके समर्थक पीठ पीछे सुर लगाकर सुनाते हैं। कुछ नेताओं का प्यार परवान चढता है तो विरोधियों के चेहरे में हल्की मुस्कराहट छा जाती है।
दिग्विजय सिंह के प्यार और जल्द शादी होने की चर्चा पर भी अब कई बातें हैं। सबसे खास यही है कि इस चर्चा से चुनावी मीटर पर कोई असर नहीं पड़ना है। उनकी शादी की चर्चा के लिए टीवी वालों को पैनल बुलाने की मशक्कत नहीं करनी है। न ही यह कांग्रेस के लिए चिंता की बात कि चुनाव निपटने देते फिर शादी कर लेते। हां, अहम बात है तो यही कि क्या दिग्गी राजा, अपनी शादी में नरेंद्र मोदी और रामदेव को बुलाएंगे। राजनीति के मैदान में जो एक दूसरे पर कड़ुवे संवादों से माहौल बदरंग हुआ है, क्या पता शादी का एक सुंदर सा निमंत्रण कार्ड रिश्तों की तनातनी में कुछ हल्कापन ला जाए।
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उधर देवर-भाभी, इधर भाई-भाई
राजनीति में यह भी गजब है। सत्ता की राजनीति क्या कुछ न करा दे। एक ही सीट पर परिवार के सदस्य आपस में उलझ पड़ते हैं। पश्चिम बंगाल में रायगंज में कांग्रेस की दीपादास मुंशी के सामने उनके ही देवर पवित्र रंजन मुंशी चुनाव लड़ रहे हैं। कांग्रेस नेता प्रियरंजन दास मुंशी की राजनीतिक विरासत को लेने के लिए दीपादास मुंशी आगे आईं तो उन्हें चुनौती अपने ही देवर से मिली। दोनों की तरफ से इस सीट के लिए जम कर चुनाव प्रचार हुआ।
लेकिन राजनीतिक विरासत की इस लड़ाई में दोनों ने वाणी में हर तरह का संयम रखा। पवित्र रंजन मुंशी ने अपनी भाभी का जिक्र पूरे सम्मान के साथ किया। उन्हें शिकायत भी भाभी से नहीं, कांग्रेस से ही रही। उनका कहना है कि भाई के बीमार पड़ने पर कांग्रेस पिछली बार उन्हें टिकट देना चाहती थी, लेकिन उन्होंने भाभी के नाम का प्रस्ताव किया। इस बार जब उनकी चुनाव लड़ने की इच्छा हुई तो कांग्रेस ने लिफ्ट नहीं दी। चुनाव तो लडना था ही, आखिर भाभी के सामने ही चुनाव लड़ना पड़ा। पर इलाके के लोग यही कह रहे हैं कि कुछ भी हो, सीट तो परिवार के पास ही आ रही है।
इसी तरह राजस्थान में दौसा की सीट पर कांग्रेस के नमोनारायण मीणा और भाजपा के हरिश्चंद मीणा दो भाइयों के बीच का मुकाबला है। यहां भी दोनों भाई ने एक दूसरे के खिलाफ किसी तरह की बयानवाजी नहीं की। लेकिन यहां राजद के ही डॉ किरोणीलाल मीणा के मैदान में आ जाने से लड़ाई थोड़ी और जटिल हो गई है। यहां राजद को मिलने वाला मत भाइयों के परिणाम में उलट फेर की संभावना रखता है। एक और लड़ाई दिलचस्प होती, मगर रावड़ी देवी के भाई ने अपनी बहन के सामने प्रत्याशी बनने से इंकार कर दिया। वरना यहां भी प्रचार के रंग ढंग और बयानवाजी पर खासी चर्चा होती।
प्रियंका का चप्पल और कांग्रेसी
रायबरेली में अपनी मां के प्रचार के लिए जुटी प्रियंका गांधी के पैरों से उनका चप्पल निकल गया। कार से उतरते समय चप्पल पैरों से निकला, मगर उन्होंने खुद ही उसे लेकर पहन लिया। रायबरेली के उत्साही कार्यकर्ताओं ने वह गलती नहीं की, जिसके लिए कुछ पुराने कांग्रेसी जनों को अब तक शर्मशार होना पड़ता है। कहा जाता है कि संजय गांधी ने एक बार एक कांग्रेसी को इसी बात पर डांट दिया था कि वह उनकी पैरों से निकली चप्पल लाकर पहनाने लगा था।
कुछ पुराने लोग यह भी कहते हैं कि वह कांग्रेसी चप्पल ले तो आया पर जल्दबाजी में या संजय गांधी जैसे नेता के सामने घबराहट में एक पांव के चप्पल दूसरे में पहनाने लगा था। कारण चाहे जो भी हो लेकिन संजय गांधी को वह सब पसंद नहीं आया था। उन्होंने सबके सामने उसे डपट दिया था। प्रियंका अपने कार्यकर्ताओं को डांटती तो नहीं, पर आज की मीडिया के चलते वह दृश्य चारों ओर फैल जाता। लिहाजा इस घटना का अलग अलग ढंग से जिक्र होता।
बाबा रामदेव को भी कहने का मौका मिल जाता कि देखो रायबरेली और अमेठी जाकर किस तरह सामंती ढंग से रहते हैं। कार्यकर्ता उन्हें चप्पल पहनाते हैं। लेकिन समझदार रायबरेली के कार्यकर्ता पूरे जोश खरोश के साथ नारेबाजी तो करते रहे लेकिन उन्होंने आगे बढ़कर चप्पल उठाने की जहमत नहीं उठाई। प्रियंका ने खुद कुछ कदम झुककर चप्पल उठाई और पहन ली। टीवी के लिए एक खबर बनते बनते रह गई।
आखिर चिरंजीवी को रोका
खबर भी तभी बनती है अगर सामने तमिल एक्टर चिरंजीवी हो। अगर वह छात्र किसी आम आदमी को लाइन पर लगकर वोट करने के लिए कहता तो आम बात होती। लेकिन यहां उसने किसी और को नहीं, चिरंजीवी को इस बात के लिए टोका कि वोट के लिए लाइन पर लगकर प्रतीक्षा करें। बस इतने भर की देर थी कि टीवी के कैमरों का फ्लैश चमकने लगा। अऩुनय विनय भी हुआ कि प्लीज वोट देकर आएं तो एक इंटरव्यू भी करना है। एक पल के लिए चिरंजीवी को भूल कर सारे रिपोर्टर उसकी बाइट के लिए मचलने लगे।
आखिर उस पर ध्यान गया तो इसका कारण भी चिरंजीवी ही था। दक्षिण भारत की संस्कृति में व्यक्ति पूजा का खासा प्रभाव है। खासकर फिल्म जगत के चर्चित स्टार वहां भगवान की तरह पूजे जाते हैं। उनकी तस्वीरें ड्राइंग रूम में ही नहीं, किचन में भी लगी होती है। ऐसे में तमिल संस्कृति और वहां के परिवेश में कोई खबर बनती है तो यही कि कोई अनजान युवक किसी चिरंजीवी जैसे स्टार को टोक दे। बजाय उसका ओटोग्राफ लेने के उसे नियम के साथ वोट करने के लिए कहे।
वह युवक वोट देकर आया ही था, कि प्रश्नों की झड़ी लग गई। कहां के रहने वाले हैं, क्या करते हैं। क्या वह जानते थे कि वह किस स्टार को अपनी लाइन में आकर वोट देने के लिए कह रहे हैं। न जाने किस सोच के साथ उस युवक ने चिरंजीवी को टोका होगा, मगर उसकी एक कोशिश से सेलिब्रिटी समाज में यह सोच जरूर गई होगी कि वह हर जगह सेलिब्रिटी नहीं है। खासकर जब चुनाव की बेला हो तो वह किसी आम मतदाता की तरह हैं। उन्हें हर नियम का पालन किसी आम आदमी की तरह ही करना चाहिए।
नरेंद्र मोदी इन दिनों अपनी सभाओं में लोगों से कह रहे हैं कि उन्हें तीन सौ कमल दीजिए। यानी तीन सौ सीटें जिताकर दीजिए। उनका आशय यही होता है कि एक कमल यानी एक उम्मीदवार। इससे उन उम्मीदवारों को थोड़ा झेंपना पड़ता है, जिनके पीछे भ्रष्ट होने, दागी होने, किसी अपराध से जुड़े होने, लोगों से किसी तरह रिश्ता न रखने की प्रवृति होती है। ऐसे कुछ उम्मीदवार चुनाव जीतने के लिए मोदी लहर के सहारे रहते हैं, लेकिन अगर उन्हें खुद कमल कहा जाए तो इससे उनके क्षेत्र में लोगों को व्यंग का मौका मिल जाता है। तो ये हैं मोदीजी के कमल।
ऐसे उम्मीदवारों को लगता है कि मोदीजी सब कुछ कहें पर उन्हें कमल न कहें। लोगों की मुस्कराहट में एक तरह का व्यंग आ जाता है। खासकर ऐसे मतदाता भी हैं जो भाजपा के किसी खास प्रत्याशी को तो वोट नहीं देना चाहते, लेकिन मोदी को प्रधानमंत्री बनते हुए देखना चाहते हैं। इसलिए उस खास उम्मीदवार को मन मनोस कर वोट दे सकते हैं। मगर उनके वोट का आशय यह नहीं होगा कि उन्होंने उस उम्मीदवार को मोदी का कमल ही मान लिया।
जानकार नेता लोगों की इस धारणा को समझते हैं। कमल के फूल के कई आशय है। यह लक्ष्मीजी को प्रिय है। यह दलदल में भी खिलता है। सूर्य की प्रथम किरण के साथ ही खिलता है और अंधेरा होते ही मुरझाता है। कमल के पुष्प को सौभाग्य संपदा से जोड़ कर देखा जाता है। ऐसे में जिस नेता का अपने विगत कार्यकलाप थोड़ा गड़बड़ हों उसे उनका नेता खुलकर कमल कह रहा हो तो वह झेंपने की स्थिति में आएगा ही। वैसे यह तो उस नेता का अपना संकोच है। मोदी के लिए तो हर जीतकर आने वाला कमल ही होगा।