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बड़ा सवाल, आप जो सोचते हैं क्या बस वही सही है?

Thu, 08 Jan 2015 04:22 PM IST
ताबिश खैर
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लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता का मूल भाव क्या है? क्या हम और आप जो सोचते हैं वही सही है? या फिर कोई दूसरी भी तस्वीर हो सकती है। एक ऐसी तस्वीर जो लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता के मौजूदा स्वरूप को नए सिरे से समझने का मौका दे। धर्मनिरपेक्षता और लोकतंत्र की दुहाई देने वालों से इतर धर्मनिरपेक्षता और लोकतंत्र के क्या हैं असली मायने।
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अगर हम अतीत की ओर देखें, तो 20वीं शताब्दी राज्य की निरकुंशता और बर्बर आतंक के सैकड़ों साल के विशाल रेगिस्तानी अतीत में किसी मृगमरीचिका (रेगिस्तान में पानी होने का भ्रम) की तरह नजर आते हैं।

हालांकि खुद ये शताब्दी भी उत्पीड़न और निरकुंशता से भरी रही है और उपनिवेशवाद इसका सबसे अहम संकेत रहा है। इसे आधुनिक दौर की निरकुंशताओं के बीच नाजीवाद और स्टालिनवाद की चुनौती का सामना करना पड़ा।
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इसके बावजूद भी जब आप अतीत की ओर देखते हैं तो ये मालूम होता है कि बीसवीं शताब्दी में व्यक्तिगत और राजनीतिक स्वतंत्रता की जीत, छोटी ही सही, लेकिन होती रही। 21वीं सदी की शुरुआत में इन्हीं जीतों को हम, लोकतंत्र या धर्मनिरपेक्षता के तौर पर सेलिब्रेट करते हैं या उसकी आलोचना करते हैं।

इसमें कोई शक नहीं होना चाहिए कि कई युद्धों और नरसंहारों वाली 20वीं सदी से हमें लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता के तौर पर दो बड़ी चीजें मिली हैं।

सबसे महान उपलब्धि

धर्मनिरपेक्षता और लोकतंत्र अपने आप संपूर्ण भले नहीं हों, लेकिन मानव इतिहास की सबसे महान उपलब्धियां हैं। ये दोनों, रेलगाड़ी और हवाईजहाज या फिर आप जो भी सोच पाएं, उसकी तुलना में बड़े आविष्कार हैं।

लेकिन मेरे ख्याल से एक बुरी बात भी 20वीं सदी में हुई है। इस सदी ने हमें लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता के विश्वसनीय उदाहरण भी दिए और धीरे-धीरे उनकी प्रकृति में मिलावट भी कर दिया।

आज अगर लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता खतरे में है तो इसलिए कि बीते कुछ दशक में बार-बार इसे गलत तरीके से परिभाषित करने की कोशिश हुई है। आप ऐसी परिभाषाएं अपने आस-पास सुनते ही होंगे। आपने सुना होगा कि लोकतंत्र आपका अधिकार है।

आपने भीड़ को ये कहते हुए सुना होगा, किसी तुनकमिज़ाज बच्चे की तरह लगभग चीख़ते हुए कि ये हमारा अधिकार है। हमारे नेता भी जब किसी भीड़ पर अपना एजेंडा थोपना चाहते हैं तो कहते हैं कि लोकतंत्र आपका अधिकार है।

कितना अहम है अधिकार?

मेरा यकीन है कि मुस्लिम धर्म गुरु, हिंदू पुजारी, ईसाई पादरी और इसराइल में बसने वाले यहूदी सब ऐसे ही चीख़ते हैं। वे चिल्लाते हैं कि आप हमारी संवेदनाओं को अपमान नहीं कर सकते। वे कहते हैं, ''हमें ऐसा करने का अधिकार है, हम लोकतंत्र में रहते हैं और हम हमेशा सही हैं।''

लेकिन ऐसा नहीं है, लोकतंत्र केवल सही होने की बात नहीं है। ये कई बार ग़लत होने की बात हो सकती है। समान नागरिकता के अधिकार का मसला ठीक वैसा नहीं है, जैसा आप एक नागरिक के तौर पर सही मानते होंगे।

इसकी वजह यही है कि आप क्यों दूसरे लोगों को अपने जैसा अधिकार देना चाहेंगे। आप गलत भी तो हो सकते हैं। कौन जाने, आप गलत हों, या वो भी ग़लत हो सकता है। या फिर आप दोनों गलत हो सकते हैं। तो सही होने को लेकर हम कभी निश्चिंत नहीं हो सकते। हममें से कोई भी नहीं।

लोकतंत्र मानवीय अशुद्धि की ईमानदार और उद्देश्यपूर्ण अवधारणा से ऊपर की स्थिति है। कोई भी सही होने का दावा नहीं कर सकता- राजा, महर्षि, किताब, दार्शनिक, वैज्ञानिक या नेता, इनमें कोई भी नहीं। ऐसे में ईमानदार और व्यवहारिक तकाजा यही है कि हर किसी को सही या गलत होने के बराबरी के मौके मिलें।

लोकतंत्र की मूलभावना

लोकतंत्र की मूलभावना केवल आपके अधिकार से जुड़ी नहीं है बल्कि सबके अधिकार से जुड़ी है। इसलिए किसी भी राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक मुद्दे पर आपकी जो भी राय हो, गलत हो सकती है।

धर्मनिरपेक्षता भी कुछ ऐसी ही चीज़ है। यह नास्ताकिता हो जरूरी नहीं। वैसे भी आधुनिक नास्तिक रिचर्ड डॉकिंस जैसे लोग कई बार इशारा कर चुके हैं कि नास्तिकता भी जिसे कहा जा रहा है, वैसी चीज नहीं है।

नास्तिकता केवल भगवान के अस्तित्व को नहीं मानना भर नहीं है। यह धर्म के साथ भी हो सकता है। भगवान के अस्तित्व के बारे में ना तो कुछ साबित हुआ और ना ही कुछ साबित नहीं हो पाया है। यही वजह है कि धार्मिक लोग चमत्कारों पर यक़ीन करते हैं।

एक नास्तिक वह आदमी नहीं हो सकता जो मानता हो कि ईश्वर का अस्तित्व नहीं है। नास्तिक वह आदमी होता है जो नहीं मानता है कि ईश्वर हैं। इन दोनों स्थितियों में बहुत बड़ा अंतर है। पहली स्थिति धर्म की है, विश्वास की है। दूसरी नास्तिकता की है, संदेह की है।
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हम भूलते जा रहे हैं?

यह वैसा ही अंतर है जैसा अंतर खुद को सही मानने के यक़ीन और ग़लत हो सकने की जानकारी में हैं। यही लोकतंत्र का सार है। आज ऐसा लगता है कि हम ये सब भूल गए हैं। चाहे धर्म का नाम हो, राष्ट्रीयता का मुद्दा हो, परंपरा की बात हो, विचारधारा की बात हो, ज्ञान की बात हो या फिर बाजार की बात हो, हम किसी मूर्ख की तरह ढीठ हो चले हैं।

हम हमेशा सही होते हैं- कभी किसी भगवान के नाम पर, कभी किसी प्राचीन विद्या के नाम पर कभी किसी पुराने कानून पर। ये सूची काफी लंबी है। ये मानवीय भूलों के हमारे अनुभवों से विपरीत है। जो आदमी ये मानता हो कि वे हमेशा सही है, उससे ज्यादा गलत कोई नहीं हो सकता।

सही होने की ज‌िद को (हमेशा सही होने की ज‌िद या दूसरे के मुकाबले सही होने का ज‌िद) मानवीय भूलों के सबूतों को देखते हुए, सही नहीं ठहराया जा सकता। कोई सही होने की कोशिश कर सकता है।

मेरे ख्याल से हर किसी को इसकी कोशिश करनी चाहिए। लेकिन ये तभी संभव है जब उसके सामने ग़लत होने की संभावना भी खुली हो। लोकतंत्र इसी वास्तविक सच्चाई का राजनीतिक पहलू है। धर्मनिरपेक्षता इसका सांस्कृतिक पहलू है। खुद को जोख‌िम में डालते हुए हम इसे भूलते जा रहे हैं।

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