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डीयू में चार साल के डिग्री कोर्स का क्या है चक्कर?

Wed, 05 Jun 2013 03:42 PM IST
भूमिका राय
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विरोध और सवालों के बीच दिल्ली विश्वविद्यालय में ग्रेजुएशन लेवल पर चार साल के कोर्स की प्रक्रिया बुधवार से शुरू हो गई है।
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नए पैटर्न का समर्थन कर रहा गुट इसके फायदे गिनाते नहीं थक रहा तो विरोधी इसकी खामियां। लेकिन लाख टके का सवाल यह है कि क्या इस पूरे तामझाम से छात्रों का भी भला होगा कि नहीं।

दरअसल दिल्ली विश्वविद्यालय ने स्नातक स्तर पर तीन वर्षीय पाठ़यक्रम में संशोधन करते हुए उसे चार साल का करने का फैसला किया है। यूनिवर्सिटी का तर्क है कि चार साल के प्रस्तावित ग्रेजुएशन कोर्स में रोजगार परक शिक्षा दी जाएगी।
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विश्वविद्यालय के इस फैसले से एक ओर जहां शिक्षकों का एक बड़ा वर्ग इसे छात्रों के बेहतर भविष्य से जोड़कर देख रहा है वहीं शिक्षकों का एक वर्ग इसे छात्रों के भविष्य से खिलवाड़ बता रहा है।

क्या है नया कोर्स?

वर्तमान में दिल्ली विश्वविद्यालय में ग्रेजुएशन स्तर पर तीन साल की पढ़ाई होती है, जिसमें दो तरह के कोर्स होते थे..ऑनर्स और पास कोर्स। लेकिन इस संशोधन के बाद ये कोर्स चार साल के हो जाएंगे।

हालांकि छात्रों के पास तीन साल में ही स्नातक होने का विकल्प जरूर रहेगा लेकिन वो ऑनर्स नहीं कहलाएंगे। मतलब अगर कोई छात्र तीन साल में ही कोर्स छोड़ना चाहे तो छोड़ सकता है लेकिन उसे बैचलर की डिग्री मिलेगी, ऑनर्स की नहीं।

ऑनर्स बनने के लिए चार साल की पढ़ाई करनी होगी। इसके अलावा दो साल में कोर्स छोड़ने वाले को डिप्लोमा दिया जाएगा।

क्या है शिक्षकों की राय?
एकेडमिक काउंसिल में बहुमत से पारित होने के बाद ही इस नए कोर्स पैटर्न को लागू किया जा रहा है।

जहां इसके समर्थक मानते हैं कि ये कोर्स पैटर्न छात्रों को रोजगार परक शिक्षा की दिशा में आगे बढ़ाएगा वहीं इसका विरोध कर रहे वर्ग का कहना है कि यह केवल समय की बर्बादी है।

कोर्स का समर्थन कर रहे एकेडमिक काउंसिल के सदस्य राजेश झा ने बताया कि ये कोर्स छात्रों को आज के सिस्टम से जोड़ेगा।

इस कोर्स में वे ज्यादा से ज्यादा सीख सकेंगे। एग्जीक्यूटिव काउंसिल से जुड़े अभय भी कुछ ऐसा ही सोचते हैं।

उनके मुताबिक दिल्ली विश्वविद्यालय हर साल ढेरों बेरोजगार पैदा करते हैं लेकिन अब इस ओर सोचने की जरूरत है। ऐसे में ये कोर्स इन्ही बातों को ध्यान में रखकर बनाया गया है।

हालांकि शिक्षकों का एक वर्ग इस पैटर्न क पक्ष में नहीं हैं।

दिल्ली विश्वविद्यालय की एक महिला प्रोफेसर के मुताबिक 'ये कोर्स बच्चों पर भार बढ़ाने जैसा है। इससे वे किसी भी विषय को पढ़ तो लेंगे लेकिन समझ नहीं पाएंगे। उनके पास इतना समय ही नहीं होगा कि वे हर चीज की गहराई में जाएं।'

साथ ही उन्हें इस बात से भी आपत्ति है कि इसे लागू करने में इतनी हड़बड़ी क्यों की जा रही है? उनके मुताबिक इसे बनाते समय फैकल्टी की राय भी नहीं ली गई है।

हालांकि अभय इससे ठीक उलट राय रखते हैं। उनका कहना है कि कोर्स बनाने में हर स्तर पर बहुमत लिया गया है। इसके अलाव जामिया-मिलिया और जम्मू-कश्मीर विश्वविद्यालय से भी राय ली गई है।

उनका ये भी कहना है कि आने वाले समय में इन यूनिवर्सिटीज में भी यही स्ट्रक्चर लागू हो सकता है। विरोध के बारे में उन्होंने कहा कि वामपंथी शिक्षक और छात्र ही इसके पीछे हैं।

क्या कहना है छात्रों का ?
एक ओर जहां डीयू प्रशासन ने नए कोर्स को इसी सत्र में लागू करने की प्रक्रिया शुरू कर दी है वहीं विद्यार्थी वर्ग का एक तबका इसका विरोध कर रहा है, जिसमें से कई पूर्व छात्र भी हैं।

उनका कहना है कि ऐसा करने से छात्रों पर अतिरिक्त भार आ जाएगा। समय और धन दोनों की ही बर्बादी होगी। इसके अलावा सर्वे एजेंसी Market Xcel Data Matrix ने पांच हजार छात्रों पर किए गए एक सर्वे में पाया कि करीब 78 फीसद छात्र जिन्होंने इस साल 12 वीं का एक्जाम दिया है, इस पैटर्न को देखते हुए अपना करियर कहीं और संवरने की सोच रहे हैं।

इसके अलावा इस फैसले से गरीब तबके के सामने एक साल के अतिरिक्त खर्च का भी भार आ जाएगा।

हड़बड़ी पर उठे सवाल
एक ओर डीयू इस पैटर्न को लागू करने पर आमादा है वहीं उच्च न्यायालय से लेकर प्रधानमंत्री तक इस हड़बड़ी को लेकर जवाब मांग चुके हैं। प्रधानमंत्री से पहले दिल्ली उच्च न्यायालय ने प्रशासन से इस जल्दबाजी की वजह पूछी थी।
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हालांकि इसे सत्तारूढ़ सरकार की सोची-समझी नीति का ही परिणाम माना जा रहा है, जिससे विदेशी यूनिवर्सिटीज के भारत आने का मार्ग खुलेगा।

विरोध कर रहे लोगों ने मानव संसाधन मंत्रालय से भी इस विषय पर चर्चा की है, जिस पर मानव संसाधन विकास मंत्री पल्लम राजू का फैसला आना बाकी है।

क्या होगा परिणाम
ये दूसरा मौका है जब महज दो साल के भीतर डीयू के कोर्स पैटर्न में बदलाव किया गया है। इससे पूर्व ईयरली सिस्टम को हटाकर सैमेस्टर सिस्टम लाया गया था।

ऐसे में एक तरफ जहां छात्रों के लिए पूरे कोर्स को दोबारा से नए स्तर पर समझना होगा वहीं विषय का बोझ बढ़ेगा।

साथ ही अतिरिक्त गतिविधियों में हमेशा आगे रहने वाले छात्रों के पास समय की किल्लत हो सकती है।

अध्यापकों पर भी अपना टारगेट जल्दी खत्म करने का दबाव होगा लेकिन यदि यह कोर्स वाकई रोजगार परक होता है तो छात्रों की सबसे बड़ी समस्या का हल निकल सकता है। साथ ही दिल्ली आकर पढ़ाई करने और नौकरी करने की छात्रों की ख्वाहिश को भी नए पंख लग सकेंगे।
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