शीला दीक्षित ने मार्च में अपना 75वां जन्म दिन मनाया, तब उम्मीद जताई गई कि कांग्रेस उन्हें इस बार बैकसीट पर भेज देगी और किसी युवा चेहरे के नेतृत्व में विधानसभा चुनावों का सामना करेगी।
और ये उम्मीद हो भी क्यों ना? शीला दीक्षित के खाते में इस बार उपलब्धियां कम और आलोचनाएं ज्यादा दर्ज थीं। कॉमनवेल्थ की गड़बडियां, दिल्ली गैंगरेप का गुस्सा और बिजली के महंगे बिल शीला के खिलाफ माहौल तैयार कर रहे थे।
हालांकि, अब तक कांग्रेस आलाकमान में शीला में ही भरोसा जताया है और संभावना है कि कांग्रेस की अगली सीएम कैंडिडेट भी वही होंगी।
दिल्ली की कुर्सी पर शीला
1998 में शीला भाजपा को प्याज के आंसू रुलाकर सत्ता में आईं। उस वक्त केंद्र की सत्ता में भाजपानीत राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन था और कांग्रेस किसी ठोस नेतृत्व के अभाव में डांवाडोल थी। उन हालात में शीला की जीत कांग्रेस की लिए संजीवनी जैसी थी।
भाजपा की आंतरिक कलह और सशक्त प्रशासक की अपनी छवि के कारण वे 2003 में भी दिल्ली के वोटरों का दिल जीतने में कामयाब रहीं। कांग्रेस ने उन चुनावों में 70 में 47 सीटें जीती थीं, जबकि उन्हीं दिनों हुए राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनावों में उसका सूपड़ा साफ हो गया था।
2008 में शीला दीक्षित विधानसभा चुनावों में उतरीं तो राजधानी में मेट्रो आ चुकी थी। दो साल बाद कॉमनवेल्थ खेल होने थे, इसलिए दिल्ली को सजाया-संवारा जा रहा था। इसकी बदौलत कांग्रेस ने एक बार फिर फतह हासिल की। हालांकि वे पिछली कामयाबी दोहरा नहीं पाए और उन्हें 70 में 43 सीटें मिलीं।
बतौर मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने तीसरा कार्यकाल भी पूरा कर लिया है और एक बार फिर चुनावी दंगल में उतर चुकी हैं। पिछले विधानसभा चुनाव तक उनके मुकाबले में केवल भाजपा थी, लेकिन इस बार उनका सामना अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी से भी है।