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महिलाओं के खिलाफ अपराध पर सुप्रीम कोर्ट सख्त

Fri, 04 Jan 2013 07:54 PM IST
नई दिल्ली/ब्यूरो
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महिलाओं, बच्चों के खिलाफ अपराधों में आरोपी सांसदों और विधायकों को अयोग्य घोषित करने की मांग पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र व राज्य सरकारों को नोटिस जारी किया। साथ ही सर्वोच्च अदालत ने दुष्कर्म मामलों की सुनवाई फास्ट ट्रैक कोर्ट में किए जाने और महिलाओं की सुरक्षा के कानूनों को लागू करने के मुद्दे पर विचार करने की मंजूरी भी प्रदान कर दी।
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सर्वोच्च अदालत ने दिल्ली में 16 दिसंबर की रात चलती बस में हुए सामूहिक दुष्कर्म की घटना के बाद दायर दो जनहित याचिकाओं पर सरकार से जवाब तलब किया है। सर्वोच्च अदालत ने हालांकि पहले कहा कि वह सीमित मुद्दों पर ही सरकार को नोटिस जारी कर सकता है क्योंकि याचिकाओं में किए गए कुछ आग्रह उसके अधिकार क्षेत्र से बाहर हैं।

जस्टिस केएस राधाकृष्णन व जस्टिस दीपक मिश्रा की पीठ ने कहा कि सांसदों और विधायकों की अयोग्यता का मुद्दा हमारे अधिकार क्षेत्र में नहीं है। लेकिन सेवानिवृत्त महिला आईएएस अधिकारी प्रोमिला शंकर की उस याचिका पर नोटिस जारी कर दिया, जिसमें महिलाओं के खिलाफ अपराध के आरोपपत्र में आरोपी ठहराए गए सांसदों और विधायकों को अयोग्य घोषित करने की मांग की गई। पीठ ने यह भी कहा कि याचिका को इस बात को भी आधार बनाना चाहिए था कि यदि ऐसे मामलों में समुचित जांच नहीं की जाती तो इसे जांच अधिकारी की ओर से किया गया कदाचार माना जाए।
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सर्वोच्च अदालत ने सरकार से कहा कि महिलाओं के खिलाफ अपराध और दुष्कर्म से संबंधित कानूनों की समीक्षा के लिए गठित जस्टिस जेएस वर्मा समिति की कार्य शर्तों के बारे में पीठ को जानकारी दी जाए। पीठ ने कहा कि अदालतों को व्यक्ति की हैसियत पर ध्यान दिए बिना मामले की सुनवाई फास्ट ट्रैक अदालत में करनी चाहिए।

हालांकि पीठ ने कहा कि फिलहाल उसने सीमित मुद्दों पर जनहित याचिका पर सुनवाई का फैसला लिया है। फास्ट ट्रैक कोर्ट और अतिरिक्त न्यायाधीशों की जरूरत पर सहमति जताते हुए पीठ ने कहा कि न्यायाधीशों के कई पद खाली हैं और अदालतों की स्थापना की जरूरत है।

प्रोमिला ने याचिका में महिलाओं और बच्चों के खिलाफ दुष्कर्म व अपराध के मामलों की जांच महिला पुलिस अधिकारी से कराने तथा ऐसे मुद्दों की सुनवाई महिला जज के समक्ष किए जाने की मांग की है। उन्होंने यह भी कहा है कि महिलाओं की सुरक्षा के मौजूदा कानूनों को प्रभावी तरीके से लागू कराने का प्रयास नहीं किया जा रहा है।

सामाजिक कार्यकर्ता ओमिका दुबे ने महिलाओं के खिलाफ अपराध के मामलों के निपटारे के लिए अतिरिक्त न्यायाधीश की नियुक्ति और पीड़िता को क्षतिपूर्ति राशि अनिवार्य रूप से देने का अनुरोध किया है।
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