देश में वामपंथियों के अकेले गढ़ पूर्वोत्तर राज्य त्रिपुरा में अबकी लोकसभा की दो सीटों के लिए 25 उम्मीदवार मैदान में हैं। यहां सीपीएम उम्मीदवारों की जीत का जिम्मा सरकार पर है। राज्य सरकार नहीं बल्कि मुख्यमंत्री मानिक सरकार पर। सरकार ही इस लाल किले में सीपीएम और सरकार का पर्याय हैं।
तृणमूल कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी की ओर से मिल रही चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए सीपीएम ने अबकी बार दो नए चेहरों को मैदान में उतारा है। पार्टी ने त्रिपुरा पश्चिम सीट पर युवा नेता शंकर प्रसाद दत्त को उम्मीदवार बनाया है और त्रिपुरा पूर्व पर युवा आदिवासी नेता व राज्य के उद्योग मंत्री जितेंद्र चौधरी को।
कांग्रेस ने भी नए चेहरों को मैदान में उतारा है। इन दोनों सीटों के लिए क्रमश: सात और 12 अप्रैल को वोट पड़ेंगे। सीपीएम वर्ष 1996 से ही राज्य की दोनों लोकसभा सीटें जीतती रही है। लेकिन वर्ष 2004 के मुकाबले पिछले लोकसभा चुनावों में उसे मिलने वाले वोटों में 10.72 फीसदी की गिरावट आई थी। शायद इसी वजह से पार्टी ने दोनों सीटों पर उम्मीदवार बदल दिए हैं।
राज्य सरकार दे रही विकास की दुहाई
पहले यहां कांग्रेस ही सीपीएम की पारंपरिक प्रतिद्वंद्वी थी। लेकिन अब तृणमूल कांग्रेस भी राज्य में अपनी पहचान बनाने के लिए जूझ रही है। पार्टी ने दोनों सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे हैं। दूसरी ओर, भाजपा भी यहां मैदान में है। मुख्यमंत्री मानिक सरकार की छवि और कामकाज ही राज्य में सीपीएम का सबसे बड़ा हथियार है।
इसी के सहारे पिछले विधानसभा चुनावों में वाममोर्चा भारी मतों से जीतकर सत्ता बरकरार रख सका था। अबकी भी पार्टी को यहां सरकार का ही सहारा है। सीपीएम ने यहां विकास कार्यों, उग्रवाद पर अंकुश, रोजगार, सांप्रदायिक सद्भाव और गरीबी हटाने को अपना चुनावी मुद्दा बनाया है।
वहीं, राज्य में पहचान बनाने उतरी तृणमूल कांग्रेस ने राज्य सरकार की नाकामी और आधारभूत सुविधाओं की कमी को अपना प्रमुख मुद्दा बनाया है। पार्टी प्रमुख ममता बनर्जी त्रिपुरा में दो चुनावी रैलियां कर चुकी हैं।
सीपीएम का दबदबा
राज्य में उग्रवाद पहले के मुकाबले कुछ कम जरूर हुआ है। लेकिन कुछ इलाकों में यह अब भी चिंता का विषय है। दोनों सीटों पर मैदान में उतरने वाली भाजपा ने नरेंद्र मोदी की अगुवाई में बदलाव की अपील की है।
अगर राजनीतिक विश्लेषकों की माने तो सीपीएम का यहां काफी दबदबा है। राजनीतिक विश्लेषक धीरेन चक्त्रस्वर्ती का कहना है कि विपक्षी राजनीतिक दल यहां एक-दूसरे के वोट काटेंगे। लेकिन सीपीएम का वोट बैंक जस का तस है। इसलिए उसको दोनों सीटों पर कब्जा बनाए रखने में कोई दिक्कत नहीं होगी।
तृणमूल कांग्रेस के उम्मीदवार रतन चक्रवर्ती का कहना है कि विपक्षी राजनीतिक दलों की आपसी खींचतान से यहां सीपीएम को फायदा हो रहा है। अब हम बदलाव चाहते हैं।